Must Visit Places in Bageshwar: बागेश्वर घूमने का प्लान बना रहे हैं और भीड़भाड़ से दूर किसी शांत जगह की तलाश है तो जौलकांडे और बोरगांव आपके लिए अच्छा विकल्प हो सकते हैं. जिला मुख्यालय से करीब 11 किलोमीटर दूर ये दोनों गांव धीरे-धीरे पर्यटन के नए ठिकाने के रूप में पहचान बना रहे हैं. यहां पहुंचकर आपको पहाड़ों की हरियाली, चीड़ के जंगल, शांत माहौल और दूर तक फैली घाटियां देखने को मिलती हैं. साफ मौसम में यहां से हिमालय की ऊंची चोटियों का नजारा भी काफी खूबसूरत दिखाई देता है.
जौलकांडे और बोरगांव की खास बात यह है कि यहां आपको शहर जैसी भागदौड़ नहीं मिलेगी. पहाड़ी ढलानों पर फैली हरियाली और जंगलों के बीच कुछ समय बिताकर आप प्रकृति के करीब महसूस कर सकते हैं. आसपास से नंदा देवी, पंचचूली और त्रिशूल पर्वत श्रृंखलाओं के सुंदर नजारे दिखाई देते हैं, जो इस जगह को और खास बनाते हैं.
चीड़ के जंगल और शांत वादियां करेंगी आकर्षित
पर्यटक स्वाति भट्ट ने बताया कि जौलकांडे और बोरगांव के आसपास फैले चीड़ के जंगल, हरी-भरी पहाड़ी ढलानें और दूर तक दिखाई देने वाली घाटियां यहां की खूबसूरती बढ़ा देती हैं. शहर की भीड़ से दूर यहां का शांत वातावरण पर्यटकों को कुछ समय प्रकृति के बीच बिताने का मौका देता है. अगर आप सुकून के साथ पहाड़ों को महसूस करना चाहते हैं तो यहां की हरियाली और शांत माहौल आपको पसंद आ सकता है. साफ मौसम में हिमालय की चोटियों का दृश्य इस सफर को और यादगार बना देता है.
बर्ड वॉचिंग के लिए भी अच्छी जगह
जौलकांडे-बोरगांव सिर्फ पहाड़ों और हरियाली के लिए ही नहीं, बल्कि बर्ड वॉचिंग के लिए भी अच्छा स्थान बन सकता है. वरिष्ठ पर्वतारोही हरीश जोशी के मुताबिक, यहां जंगल और ग्रामीण वातावरण होने के कारण अलग-अलग प्रजातियों के पक्षियों को उनके प्राकृतिक माहौल में देखने का मौका मिल सकता है. बागेश्वर के दूसरे पहाड़ी इलाकों में भी बर्ड वॉचिंग और प्राकृतिक वातावरण में पक्षियों व वन्यजीवों को देखने जैसी गतिविधियों को पर्यटन से जोड़ने की संभावनाएं हैं. ऐसे में जौलकांडे-बोरगांव में भी इसे बढ़ावा दिया जा सकता है.
युवाओं के लिए खुल सकते हैं रोजगार के रास्ते
बर्ड वॉचिंग जैसी गतिविधियां स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के नए रास्ते भी खोल सकती हैं. अगर युवाओं को इसके लिए प्रशिक्षण दिया जाए तो वे पर्यटकों को स्थानीय पक्षियों, पेड़-पौधों और आसपास के प्राकृतिक स्थलों की जानकारी देकर गाइड के तौर पर काम कर सकते हैं. इससे पर्यटकों को घूमने के दौरान स्थानीय जानकारी मिलेगी और गांव के युवाओं को अपने ही क्षेत्र में कमाई का मौका मिल सकता है. पर्यटन बढ़ने से स्थानीय दुकानदारों और दूसरे छोटे कारोबारों को भी फायदा मिलने की उम्मीद है.
कैंपिंग और इको-टूरिज्म का भी ले सकते हैं मजा
पर्यटक निकिता जोशी का कहना है कि जौलकांडे-बोरगांव में कैंपिंग और इको-टूरिज्म को भी विकसित किया जा सकता है. सोचिए, दिनभर पहाड़ों की खूबसूरती देखने के बाद रात में प्रकृति के बीच कैंप में ठहरना और सुबह उठकर सामने हिमालयी चोटियों को देखना कितना खास अनुभव हो सकता है. पक्षियों की आवाजों के बीच सुबह की शुरुआत और चारों तरफ फैली हरियाली इस जगह को प्रकृति पसंद करने वाले लोगों के लिए खास बना सकती है.
घूमने के साथ पर्यावरण का भी रखें ध्यान
पर्यटन बढ़ने के साथ पर्यावरण को बचाना भी उतना ही जरूरी है. जंगल और प्राकृतिक इलाकों में घूमने आने वाले पर्यटकों को प्लास्टिक और कूड़ा नहीं फैलाना चाहिए. जंगल में आग से बचाव के लिए भी सावधानी रखनी होगी. स्थानीय स्तर पर पर्यटकों को प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बारे में जागरूक किया जाए तो इस क्षेत्र को लंबे समय तक खूबसूरत बनाए रखा जा सकता है.
ग्रामीण संस्कृति को करीब से जानने का मौका
जौलकांडे और बोरगांव की यात्रा में पर्यटकों को सिर्फ प्राकृतिक नजारे ही नहीं मिलेंगे. यहां कुमाऊं की ग्रामीण संस्कृति और पहाड़ी जीवनशैली को भी करीब से देखने का मौका मिलेगा. गांव का शांत माहौल, पहाड़ी ढलानें और स्थानीय जीवन इस सफर को सामान्य पर्यटन स्थलों से थोड़ा अलग अनुभव दे सकते हैं.
साफ मौसम में नंदा देवी, पंचचूली और त्रिशूल जैसी हिमालयी चोटियों के शानदार नजारे, जंगलों की हरियाली, बर्ड वॉचिंग, कैंपिंग और ग्रामीण जीवन का अनुभव जौलकांडे-बोरगांव को बागेश्वर के उभरते पर्यटन स्थलों में शामिल कर सकता है. जिला प्रशासन और पर्यटन विभाग की ओर से बर्ड वॉचिंग जैसे कार्यक्रम और इको-टूरिज्म को बढ़ावा दिया जाए तो आने वाले समय में यह क्षेत्र पर्यटकों के लिए और आकर्षक बन सकता है.



