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भारत का ये गांव कहलाता है ‘मिनी इजरायल’, खूबसूरती पर फिदा विदेशी, भारतीय क्‍यों नहीं जाते?


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भारत में खूबसूरती की कोई सीमा नहीं है. यहां ऐसी-ऐसी जगहें हैं, जिनके बारे में खुद भारतीय लोगों को नहीं पता होता है, लेकिन विदेशियों में ये बहुत लोकप्रिय हैं. यहां हर साल हजारों विदेशी आते हैं, लुत्फ उठाते हैं और शहर लौट जाते हैं, जबकि भारतीय लोग इन जगहों से किलो दो किलोमीटर की दूरी पर अपने जान-पहचान के शहरों या गांवों से होकर लौट जाते हैं. आज हम आपको ऐसे ही एक गांव के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसे मिनी इजरायल कहते हैं..असल में यह भारत के हिमाचल प्रदेश का एक छोटा सा गांव है.. आइए जानते हैं पूरी कहानी…

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इजरायल के बारे में तो आपने सुना ही होगा, वह एक देश है, लेकिन आपसे कहा जाए कि भारत में भी एक इजरायल है तो शायद आपको यकीन न हो. पर ये सच है. भारत के हिमाचल प्रदेश में एक ऐसा छोटा सा गांव है जिसे मिनी इजरायल के नाम से जाना जाता है. यह इतना खूबसूरत है कि विदेशी और खासतौर पर इजरायली लोग फिदा हैं. वे जब भारत आते हैं तो इस गांव में जाकर ठहरते हैं, यहां फलाफल का स्वाद चखते हैं और हिब्रू बोलते हैं. यह गांव उनके लिए घर जैसा है, जिसका नाम है धर्मकोट.

बता दें कि दशकों से इजराइल के लोग कांगड़ा जिले के धर्मकोट में शांति की तलाश में आते रहे हैं. आज इस गांव ने खुद को अपने मेहमानों के हिसाब से इतना बदल लिया है कि यह भारत का शहर ही नहीं लगता, बल्कि इजरायल जैसा लगता है और यही वजह है कि जब सैलानी आते हैं तो वे पूछते हैं कि मिनी इजरायल कहां है? यह कांगड़ा जिले का एक पॉपुलर स्थल है.

यह मिनी इजरायल, हिमाचल प्रदेश में धौलाधार पर्वत श्रृंखला से जुड़ा और धर्मशाला के मैक्लोडगंज से दो किलोमीटर की दूरी पर मौजूद एक गांव है. भले ही इनके बीच में दो किमी की दूरी है लेकिन धर्मकोट और मैकलॉडगंज के माहौल में जमीन और आसमान का अंतर है. धर्मशाला से ऊपर चढ़ते हुए मैकलॉडगंज के बौद्ध प्रार्थना झंडे, चमकदार कैफे और मोमो, लाफिंग की खुशबू जहां खत्म हो जाती है, वहां से हिब्रू भाषा के साइनबोर्ड, घर जैसी बेकरी और ताजी बेकी हुई चल्लाह ब्रेड की खुशबू शुरू हो जाती है. यहीं से धर्मकोट शुरू हो जाता है.

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धर्मकोट हिमाचल की राजधानी शिमला से करीब 240 किलोमीटर दूर है. इसका सबसे नजदीकी शहर धर्मशाला है और निकटतम हवाई अड्डा कांगड़ा के गग्गल में करीब 20 किलोमीटर दूर है. यहीं से इजरायल से उतरने वाले मेहमान सीधा ढूंढते हुए धर्मकोट पहुंचते हैं और शांति महसूस करते हैं. आज यह भारत में इजरायलियों का सबसे पसंदीदा स्थान बन गया है.

यहां कई ऐसे इजरायली हैं जो पूरी तरह भारत के रंग में रंग चुके हैं, यहां शादी कर चुके हैं, यहीं रहकर बच्चे पाल रहे हैं. जबकि एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की भी है जो यहां सिर्फ टूरिस्ट वीजा पर घूमने आते हैं. धर्मकोट के ठीक पास में ही भागसूनाग भी है. लेकिन सबसे दिलचस्प है कि धर्मशाला और मैग्लोडगंज के एकदम नजदीक होने के बाद भी लाखों भारतीय यहां नहीं आ पाते हैं और यहां से दो किमी दूर से ही इसलिए लौट जाते हैं क्योंकि उन्हें इसके बारे में जानकारी ही नहीं होती.

सालों से कई इजराइलियों ने धर्मकोट को अपना दूसरा घर बना लिया है. वे बार-बार छोटे अंतराल के बाद पर्यटक वीजा पर भारत आते हैं; कई लोगों ने अपनी आजीविका के लिए खुद के छोटे-मोटे कारोबार भी शुरू कर रखे हैं. धर्मकोट के स्थानीय निवासी इन इजराइली मेहमानों के प्रति खास लगाव रखते हैं और उन्हें घर जैसा महसूस कराने की कोशिश करते हैं. हालांकि ईरान के साथ युद्ध के बाद इस सीजन में इजराइली पर्यटकों की संख्या कम हो गई है.

धर्मकोट के पहाड़, हरियाली, ठंडा वातावरण और खूबसूरती के अलावा यहां ज्वेलरी शॉप, यहां संगीत की कक्षाएं, संगीत वाद्ययंत्र बनाने की कक्षाएं और योग की वर्कशॉप काफी पॉपुलर हैं. यहां विदेशी आकर इन स्किल्स को सीखते भी हैं. धर्मकोट को पसंद करने का एक कारण इसकी एकांत प्रकृति भी है, जहां उन्हें अपना निजी स्थान मिल जाता है. इसलिए घरेलू पर्यटकों का आना, जो अक्सर सोशल मीडिया रील के लिए आते हैं, कई इजराइलियों को पसंद नहीं आता.

हालांकि लोगों को इस बारे में नहीं पता कि धर्मकोट कैसे दूरदराज के चरवाहा गांव से “मिनी इजराइल” बन गया. शुरुआत में धर्मकोट गद्दी (चरवाहा) समुदाय का गांव था. उनकी मुख्य आजीविका पशुपालन, छोटी खेती और दिहाड़ी मजदूरी थी. इजराइली कब और कैसे इस गांव में आने लगे, इसका ठीक-ठीक प्रमाण कम लोगों को पता है. लोगों का मानना है कि यह सब 1960 के दशक में धर्मशाला (मैकलॉडगंज के पास) में परम पावन दलाई लामा की मौजूदगी की वजह से हुआ. उनकी मौजूदगी ने पूरे इलाके को बदल दिया.

हालांकि इजराइल के यहूदी लोगों का उनसे कोई सीधा संबंध नहीं है, फिर भी दलाई लामा मायने रखते हैं. जैसे-जैसे यहां विदेशी आने लगे, उन्होंने अपनी व्यवस्थाएं बनानी शुरू कर दीं. वे यहां जमीन खरीद नहीं सकते, इसलिए लीज पर लेने लगे; राजस्थान, पश्चिम बंगाल और गोवा जैसे दूसरे राज्यों के लोग भी जमीन लीज पर लेकर खासकर आतिथ्य क्षेत्र में कारोबार चलाते हैं. यहां स्थानीय लोग हिब्रू बोल लेते हैं. दुकानों पर “फोटो-वीडियो मना है” लिखा रहता है क्योंकि इजराइली पर्यटक पूरी प्राइवेसी चाहते हैं. कई दुकानें पैसे बदलने का काम भी करती हैं.

आज यह गांव इतना बदल गया है कि ऐसा घर ढूंढना मुश्किल है जो पूरी तरह खेती और पशुपालन पर निर्भर हो जो उनके पुरखों का काम था. “इस गांव के हर घर में होमस्टे, गेस्ट हाउस, कैफे या खाने की दुकान है, जहां हर तरह का खाना बनता है, खासकर फलाफेल, पीटा और शक्शुका जैसे व्यंजन मिलते हैं.पहले ग्राम पंचायत रहा धर्मकोट अब धर्मशाला नगर निगम के अंतर्गत आता है.

यहां विदेशी ज्यादा से ज्यादा घूमना-देखना चाहते हैं. धर्मकोट के आसपास एडवेंचर गतिविधियों से भरा इलाका है. त्रियुंड ट्रेकिंग ट्रेल है, लाका ग्लेशियर है. अनुभवी पर्वतारोही मून पीक चढ़ सकते हैं. पैराग्लाइडिंग का स्वर्ग बिर-बिलिंग भी कांगड़ा जिले में है. ये सब चीजें विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं. लेकिन भारतीय भी अगर जाना चाहें तो यहां आसानी से जा सकते हैं आखिर ये भारत का ही खूबसूरत गांव है और यहां के सरल जीवन का आनंद ले सकते हैं.



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