मौजूदा व्यवस्था में केंद्रीय जीएसटी कानून की धारा 69 गिरफ्तारी की शक्ति से संबंधित है। इसके तहत निर्धारित परिस्थितियों में आयुक्त के पास किसी अधिकारी को गिरफ्तारी के लिए अधिकृत करने की शक्ति होती है। वहीं जीएसटी कानून में कुछ गंभीर अपराधों के लिए आपराधिक कार्रवाई का भी प्रावधान है। इसका उद्देश्य गंभीर टैक्स चोरी, फर्जी इनपुट टैक्स क्रेडिट, गलत रिफंड और फर्जी चालान जैसे मामलों में कार्रवाई करना है। जीएसटी परिषद के पुराने दस्तावेजों में गिरफ्तारी की शक्ति को सीमित रखने, गंभीर अपराधों पर ध्यान देने और केवल टैक्स की व्याख्या या आकलन से जुड़े विवादों में गिरफ्तारी से बचने जैसे मुद्दों पर चर्चा दर्ज है।
प्रस्तावित बदलाव का एक अहम पहलू यह है कि गिरफ्तारी की प्रक्रिया में न्यायिक निगरानी बढ़ाई जा सकती है। यदि अदालत की मंजूरी को अनिवार्य बनाया जाता है, तो किसी कारोबारी या व्यक्ति की गिरफ्तारी से पहले न्यायिक स्तर पर मामले की जांच और आधार पर विचार किया जा सकेगा। इससे गिरफ्तारी और टैक्स विवाद के बीच अंतर स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं होगा कि टैक्स चोरी के मामलों में सरकार की कार्रवाई खत्म हो जाएगी। टैक्स विभाग अब भी बकाया टैक्स की वसूली कर सकता है और कानून के मुताबिक ब्याज तथा जुर्माना लगाया जा सकता है।
आपराधिक मुकदमे की सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव भी इसी व्यापक बदलाव का हिस्सा माना जा सकता है। यहां यह समझना जरूरी है कि अगर अभियोजन की सीमा बढ़ती है, तो निर्धारित सीमा से कम टैक्स विवाद या चोरी की रकम अपने आप माफ नहीं हो जाती। ऐसे मामलों में टैक्स की वसूली और ब्याज-जुर्माने की कार्रवाई अलग प्रक्रिया के तहत जारी रह सकती है। वहीं फर्जी चालान, जानबूझकर टैक्स चोरी या गंभीर धोखाधड़ी जैसे मामलों में आपराधिक कार्रवाई के प्रावधान अलग से लागू हो सकते हैं। जीएसटी परिषद ने पहले भी अभियोजन की मौद्रिक सीमा को ₹1 करोड़ से ₹2 करोड़ करने पर विचार किया था और फर्जी चालान जैसे मामलों को अलग रखने की बात सामने आई थी।
कुल मिलाकर, अगर प्रस्तावित सुधार मंजूर होते हैं, तो जीएसटी प्रवर्तन व्यवस्था में गिरफ्तारी की बजाय टैक्स वसूली, ब्याज, जुर्माना और गंभीर मामलों में न्यायिक प्रक्रिया पर ज्यादा जोर दिखाई दे सकता है। इससे सामान्य कारोबारी विवादों और जानबूझकर की गई गंभीर टैक्स धोखाधड़ी के बीच अंतर करने की कोशिश मजबूत हो सकती है। हालांकि, अंतिम नियम क्या होंगे, किन अपराधों पर लागू होंगे और अदालत की मंजूरी की प्रक्रिया कैसी होगी, यह परिषद के अंतिम निर्णय और संबंधित कानूनी संशोधनों के बाद ही स्पष्ट होगा।