पुलिस का दावा है कि इन नंबरों से वॉट्सऐप अकाउंट एक्टिव किए गए और उनकी गतिविधियों के तकनीकी जांच में पाकिस्तान से कनेक्शन सामने आया. जांच का एक अहम सवाल यह है कि भारत में जारी सिम कार्ड आखिर पाकिस्तान कैसे पहुंचे और वहां बैठकर इनका इस्तेमाल किसने किया?
जांच अधिकारियों के मुताबिक, वॉट्सऐप एक्टिवेशन के लिए जरूरी ओटीपी उस समय प्राप्त हुआ, जब संबंधित सिम कार्ड पाकिस्तान में मौजूद था. इससे एजेंसियों को आशंका है कि भारतीय नंबरों का इस्तेमाल पाकिस्तान में बैठे ऑपरेटिव्स कर रहे थे.
जांच में इन वॉट्सऐप अकाउंट्स की लोकेशन पाकिस्तान के रावलपिंडी, लाहौर और कराची में स्थित सैन्य प्रतिष्ठानों से जुड़े होने की बात सामने आई है. यही कड़ी इस पूरे मामले को सामान्य साइबर या फर्जी सिम मामले से आगे ले जाकर कथित जासूसी नेटवर्क की जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाती है.
सुरक्षा एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इन नंबरों से भारत में किन लोगों को फोन या वॉट्सऐप संदेश भेजे गए. क्या इन संपर्कों के जरिए किसी महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान, सुरक्षा व्यवस्था या कंट्रोल रूम से संबंधित जानकारी हासिल करने की कोशिश की गई और यदि हां, तो वह जानकारी आगे कहीं भेजी गई या नहीं… इन सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं.
जांच में बांग्लादेश के रंगपुर निवासी अकबर हुसैन उर्फ सम्राट का नाम भी सामने आया है. पुलिस को आशंका है कि उसका संपर्क पाकिस्तान से जुड़े किसी ऑपरेटिव से था. बताया जा रहा है कि वह भारत-बांग्लादेश सीमा के आसपास सक्रिय था.
एजेंसियां इस एंगल की भी जांच कर रही हैं कि भारतीय सिम कार्ड को पहले भारत-बांग्लादेश सीमा के जरिए बांग्लादेश पहुंचाया गया और फिर ढाका या काठमांडू के रास्ते पाकिस्तान भेजा गया. इस संभावित रूट में एक नेपाली नागरिक विशाल शाह की भूमिका भी जांच के दायरे में है. यानी जांच की कड़ियां सिर्फ भारत और पाकिस्तान तक सीमित नहीं हैं. बांग्लादेश और नेपाल से जुड़े संभावित संपर्कों को भी एजेंसियां खंगाल रही हैं.
जांच में कूचबिहार से जुड़े राशिदुल हक, नूर नासिरुद्दीन अली और मोहम्मद शफीकुल इस्लाम के नाम सामने आए हैं. पुलिस के मुताबिक, इन लोगों के अकबर हुसैन उर्फ सम्राट के संपर्क में होने की बात सामने आई है.
इनकी कथित भूमिका क्या थी, सिम कार्ड की आवाजाही में इनका कोई योगदान था या ये सिर्फ संपर्क में थे? इन सवालों की पड़ताल की जा रही है. साहेबगंज पुलिस स्टेशन, दिनहाटा, कूचबिहार में दर्ज मामले की जांच इसी नेटवर्क की कई कड़ियों को जोड़ने की कोशिश कर रही है.
इस जांच में एक बड़ा मोड़ तब आया जब दिल्ली पुलिस क्राइम ब्रांच और पश्चिम बंगाल एसटीएफ के संयुक्त ऑपरेशन में दिल्ली के हौजरानी इलाके से सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रदीप्त बसु को गिरफ्तार किया गया. मूल रूप से पश्चिम बंगाल का रहने वाला बसु कथित तौर पर आईएसआई से संपर्क के शक में जांच एजेंसियों के निशाने पर आया.
जांच के मुताबिक, गिरफ्तारी से पहले वह करीब 10 दिनों से हौजरानी इलाके में रह रहा था और वहां कुछ बांग्लादेशी नागरिकों के साथ संपर्क में था. बताया गया है कि कुछ बांग्लादेशी नागरिक इलाज के लिए दिल्ली आए थे और उनके ठहरने तथा मेडिकल व्यवस्था में बसु की भूमिका थी.
एजेंसियां यह भी जांच कर रही हैं कि क्या वह पहले भी मेडिकल सहायता के नाम पर बांग्लादेशी नागरिकों को दिल्ली लाता रहा था और क्या इस गतिविधि का संबंध कथित खुफिया नेटवर्क से था.
प्रदीप्त बसु के बारे में जांच में यह जानकारी भी सामने आई है कि वह भारत-बांग्लादेश सीमा क्षेत्र में मनी एक्सचेंज के काम से जुड़ा हुआ था. यही वजह है कि जांच एजेंसियां उसके वित्तीय लेनदेन और सीमा पार संपर्कों को भी खंगाल रही हैं. पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि उसके संपर्क किन लोगों से थे और क्या इन संपर्कों का संबंध SIM कार्ड, डिजिटल कम्युनिकेशन या कथित विदेशी नेटवर्क से था.
मामले की एफआईआर में राशिदुल हक, नूर नासिरुद्दीन अली, मोहम्मद शफीकुल इस्लाम, प्रदीप्त बसु, अकबर हुसैन उर्फ सम्राट, बांग्लादेशी नागरिक उमर और नेपाली नागरिक विशाल शाह के नाम सामने आए हैं. इसके अलावा कुछ अन्य लोगों की पहचान अभी की जानी बाकी है. पुलिस इन सभी के बीच संपर्क, मोबाइल और वॉट्सऐप कम्युनिकेशन, सिम कार्ड की आवाजाही, वित्तीय लेनदेन और संभावित अंतरराष्ट्रीय कड़ियों की जांच कर रही है.
जांच एजेंसियों का सबसे बड़ा सवाल अब यही है कि इस पूरे नेटवर्क का वास्तविक मकसद क्या था. क्या भारतीय सिम और वॉट्सऐप अकाउंट केवल संपर्क बनाए रखने के लिए इस्तेमाल हो रहे थे या इनके जरिए भारत के संवेदनशील प्रतिष्ठानों और कंट्रोल रूम से जुड़ी जानकारी जुटाने की कोशिश की जा रही थी? एजेंसियां यह भी पता लगाने में जुटी हैं कि पाकिस्तान में बैठे कथित ऑपरेटिव्स ने भारत में किन लोगों को निशाना बनाया, उनसे किस तरह की जानकारी मांगी और क्या कोई संवेदनशील सूचना वास्तव में पाकिस्तान तक पहुंची.
फिलहाल सामने आए सभी आरोप जांच का हिस्सा हैं और इन्हें अदालत में साबित किया जाना बाकी है. सुरक्षा एजेंसियों का फोकस अब इस कथित नेटवर्क की पूरी संरचना सामने लाने, विदेशी संपर्कों की पुष्टि करने और यह पता लगाने पर है कि भारत से कोई संवेदनशील जानकारी बाहर भेजी गई थी या नहीं.



