भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) रिसर्च ने अपनी ताजा ‘इकोव्रैप’ रिपोर्ट में एक बड़ी चेतावनी दी है। रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अक्तूबर और दिसंबर में अपनी नीतिगत दरों में 25-25 आधार अंक की वृद्धि कर सकता है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और व्यापक मुद्रास्फीति का दबाव इसका मुख्य कारण है। ये कदम महंगाई को और ऊपर धकेलने की आशंका पैदा कर रहे हैं।
एसबीआई रिसर्च ने स्पष्ट किया कि ये अपेक्षित दर वृद्धि आर्थिक जोखिमों के कारण होगी। यह अमेरिकी फेडरल रिजर्व की किसी भी संभावित कार्रवाई से स्वतंत्र होगी। 2022 में भी आरबीआई ने ऐसा ही दृष्टिकोण अपनाया था। रिपोर्ट ने आगामी अक्तूबर नीति में 25 आधार अंक की दर वृद्धि की जोरदार वकालत की है। इसके बाद दिसंबर में भी इतनी ही वृद्धि की बात कही गई है। कच्चे तेल के दाम हाल ही में 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के पार चले गए हैं। भू-राजनीतिक अनिश्चितता बढ़ने से ऐसा हुआ है। एसबीआई रिसर्च के अनुसार, कच्चा तेल अगले 15 दिनों में 123 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। एक वैकल्पिक मॉडल में औसत मूल्य 105 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल रहने का अनुमान है।
महंगाई क्यों बन रही है बड़ी चुनौती?
रिसर्च ने संकेत दिया है कि महंगाई अब अधिक व्यापक हो रही है। उसके विश्लेषण के अनुसार, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) में 90 फीसदी भारित योगदान देने वाली वस्तुओं की संख्या बढ़ी है। यह जनवरी 2026 में 22 से बढ़कर जुलाई में 53 हो गई है। कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस जैसे क्षेत्रों में इनपुट लागत तेजी से बढ़ रही है। पेय पदार्थ, फार्मास्युटिकल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में भी यही स्थिति है। इससे उपभोक्ता कीमतों पर अधिक प्रभाव पड़ने की गुंजाइश है।
क्या आरबीआई को तुरंत कदम उठाना चाहिए?
एसबीआई रिसर्च का मानना है कि सीपीआई में पूरे प्रभाव के आने का इंतजार करना जोखिम भरा होगा। इससे महंगाई के और अधिक जड़ें जमाने का खतरा बढ़ जाएगा। इसलिए अक्तूबर में दर वृद्धि करना आवश्यक है। यह महंगाई को नियंत्रित करने के लिए समय पर प्रतिक्रिया होगी। रिपोर्ट में भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड पर दबाव जारी रहने की भी उम्मीद है। बेंचमार्क 10-वर्षीय यील्ड 7 फीसदी से ऊपर चला गया है।
बॉन्ड यील्ड और तरलता पर क्या होगा असर?
एसबीआई रिसर्च को उम्मीद है कि यह यील्ड 10-15 आधार अंक और बढ़कर 7.15 फीसदी या उससे अधिक हो सकता है। तेल की कीमतें आयातित महंगाई, विनिमय दर दबाव और अनिश्चितता को बढ़ा रही हैं। बैंकिंग प्रणाली में वर्तमान अतिरिक्त तरलता अस्थायी रहने की संभावना है। यह अगले तीन से चार महीनों में कम हो सकती है। क्रेडिट मांग मजबूत होने और त्योहारी अवधि के दौरान मौसमी मांग बढ़ने से तरलता अवशोषित हो जाएगी।



