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स्वर्ग को देता टक्कर…बादलों को छूता उत्तराखंड का ये गांव, यहां न आना सबसे बड़ी भूल


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Bageshwar News : समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर बसे बागेश्वर के लीती गांव की हरियाली, सीढ़ीनुमा खेत, बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों के नजारे और यहां की सादगी देखते ही बनती है. लीती गांव पर्यटन के क्षेत्र में तेजी से पहचान बना रहा है. मशहूर नामिक ग्लेशियर ट्रेक की शुरुआत भी इसी गांव से होती है. लक्ष्मण सिंह कोरंगा अपने घर पर ही होमस्टे चलाते हैं. लोकल 18 से वे कहते हैं कि सुबह-सुबह पक्षियों की चहचहाहट, खेतों में काम करते गांव वाले और चारों ओर फैली प्राकृतिक खूबसूरती आपके इस प्रवास को और भी यादगार बना देगी. मेहमानों को मंडुवे की रोटी, भट्ट की चुड़कानी, गहत की दाल, झंगोरे की खीर, आलू के गुटके और मौसमी हरी सब्जियां से तैयार खाना परोसा जाता है.

बागेश्वर. उत्तराखंड के बागेश्वर का लीती गांव अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत वातावरण और पारंपरिक पहाड़ी संस्कृति के लिए जाना जाता है. समुद्र तल से 2000 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस गांव तक पहुंचने वाले पर्यटक यहां की हरियाली, सीढ़ीनुमा खेत, बर्फ से ढकी हिमालय की चोटियों के नजारे और गांव की सादगी को देखकर खुश हो जाते हैं. पिछले कुछ वर्षों में लीती गांव पर्यटन के क्षेत्र में तेजी से पहचान बना रहा है. प्रसिद्ध नामिक ग्लेशियर ट्रेक की शुरुआत भी इसी गांव से होती है, इसलिए हर साल बड़ी संख्या में ट्रेकर और प्रकृति प्रेमी यहां पहुंचते हैं. इसी गांव में स्थानीय निवासी लक्ष्मण सिंह कोरंगा अपने घर पर ही होमस्टे का संचालन कर रहे हैं. यह होमस्टे उन लोगों के लिए खास है, जो होटल की बजाय गांव के माहौल में रहकर उत्तराखंड की असली संस्कृति को करीब से देखना और महसूस करना चाहते हैं. लोकल 18 से लक्ष्मण सिंह कोरंगा कहते हैं कि यहां आने वाले मेहमानों का स्वागत पारंपरिक पहाड़ी अंदाज में किया जाता है, जिससे उन्हें घर जैसा अपनापन महसूस होता है.

होमस्टे की सबसे बड़ी विशेषता यहां मिलने वाला स्थानीय भोजन है. लक्ष्मण सिंह कोरंगा के मुताबिक, मेहमानों को पहाड़ के पारंपरिक व्यंजन जैसे मंडुवे की रोटी, भट्ट की चुड़कानी, गहत की दाल, झंगोरे की खीर, आलू के गुटके, मौसमी हरी सब्जियां और गांव में उपलब्ध ताजा उत्पादों से तैयार खाना परोसा जाता है. लकड़ी के चूल्हे पर बने इन व्यंजनों का स्वाद पर्यटकों को पहाड़ी जीवन की सादगी और पारंपरिक खानपान से रूबरू कराता है.

कितने का एक कमरा

यहां ठहरने की सुविधा भी किफायती है. होमस्टे में 700 रुपये प्रति बेड और 1000 रुपये प्रति कमरा के हिसाब से रुकने की व्यवस्था उपलब्ध है. साफ-सुथरे कमरे, शांत वातावरण और परिवार जैसा व्यवहार पर्यटकों को बार-बार यहां आने के लिए प्रेरित करता है. सुबह पक्षियों की चहचहाहट, खेतों में काम करते ग्रामीण और चारों ओर फैली प्राकृतिक खूबसूरती इस प्रवास को और भी यादगार बना देती है. लक्ष्मण सिंह कोरंगा कहते हैं कि पर्यटक चाहें तो गांव की दैनिक गतिविधियों का हिस्सा भी बन सकते हैं. खेतों की सैर, स्थानीय लोगों से बातचीत, पारंपरिक खेती को नजदीक से देखना और पहाड़ी जीवनशैली को समझना यहां के अनुभव को खास बना देता है. नामिक ग्लेशियर ट्रेक पर जाने वाले यात्रियों के लिए यह होमस्टे एक सुविधाजनक पड़ाव भी माना जाता है.

प्रकृति की गोद

होमस्टे पर्यटन से गांव में रोजगार के नए अवसर पैदा हुए हैं, इससे स्थानीय युवाओं को अपने गांव में ही आय का साधन मिल रहा है और पर्यटकों को उत्तराखंड की संस्कृति, खानपान और मेहमाननवाजी को करीब से जानने का अवसर भी मिल रहा है. यदि आप भी शहर की भागदौड़ से दूर कुछ दिन प्रकृति की गोद में बिताना चाहते हैं, तो बागेश्वर का लीती गांव और यहां का ये होमस्टे आपके लिए एक बेहतरीन हो सकता है.

About the Author

Priyanshu Gupta

प्रियांशु गुप्‍ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें



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