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Child Marriage Free India: भारत में बदली तस्वीर, आवाज उठाने लगी बेटियां, 25 सालों 7 करोड़ बाल विवाह रोके गए


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Child Marriage Free India: शहर की चकाचौंध से दूर बसे गांवों में कभी लड़कियों की किस्मत का फैसला बड़े-बुजुर्ग कर देते थे। परंपरा के नाम पर उनका बचपन अक्सर बाल विवाह में गुम हो जाता था और किसी में आवाज उठाने की हिम्मत न थी। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। कई सालों की चुप्पी टूट रही है। खुद लड़कियां आगे बढ़कर इस कुप्रथा के खिलाफ खड़ी हो रही हैं। वो बेहिचक प्रशासन तक पहुंचती हैं, बोलती हैं कि मैं अभी शादी नहीं करुंगी।

प्रशासन भी अब सिर्फ देख नहीं रहा बल्कि एफआईआर दर्ज करता है, जिससे आरोपियों पर कार्रवाई होने लगी है। और बदलाव की ये लहर सिर्फ एक गांव या जिले तक ही सीमित न होकर देशव्यापी रूप ले चुकी है। हालांकि गरीबी, पितृसत्ता और पुरानी सोच अभी भी मुश्किलें पैदा करती हैं, लेकिन समाज अब इन बेड़ियों को तोड़ने का रास्ता चुन चुका है। इसलिए सदियों से चली आ रही मान्यता को लोग अब खुलकर चुनौती दे रहे हैं।

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इसी मुद्दे पर कोलंबिया यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल एंड पब्लिक अफेयर्स की हाल ही में आई रिपोर्ट ‘एक्सेलेरेटिंग एफर्ट्स टू एंड चाइल्ड मैरिज’ बताती है कि दुनिया भर में बाल विवाह के मामलों में कमी आई है। 2012 में जहां बाल विवाह की दर लगभग 23 प्रतिशत थीं, वहीं 2022 में घटकर 19 प्रतिशत रह गई है। पिछले 25 सालों में करीब 7 करोड़ बाल विवाह रोके गए हैं। यह गिरावट अपने आप में बहुत बड़ी है, लेकिन अहम सवाल कि यह बदलाव कहां से और कैसे हो रहा है?

इसी क्रम में दक्षिण एशिया, जो कभी बाल विवाह की सबसे ऊंची दरों के लिए जाना जाता था, वहां 18 साल से पहले लड़की की शादी की संभावना 2004 की दर से लगभग 50 फीसदी घटकर 2024 में 26 फीसदी रह गई है। इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा योगदान भारत का है क्योंकि भारत में बाल विवाह अब सिर्फ यह तो होता आया है की कहानी को पीछे छोड़ते हुए इस सिलसिले को तोड़ रहा है। ये परिवर्तन केवल जागरूकता के रूप में ही नहीं है, बल्कि शिकायतों पर त्वरित अमल और प्रतिक्रिया के इकोसिस्टम में व्यापक बदलाव के रूप में है। इसलिए जो कुप्रथा समाज में बिना किसी सवाल के चलती रही, अब उसे रोका जा रहा है, रिपोर्ट किया जा रहा है और उस पर सख्त कार्रवाई हो रही है। जो कानूनी प्रावधान लंबे समय से केवल कागजों पर थे, वो अब थानों और अदालतों में अपने उद्देश्य को हासिल कर रहे हैं। परिणाम स्वरूप बाल विवाह रोके जा रहे हैं। एफआईआर दर्ज हो रही है और जवाबदेही नजर आने लगी है।

इस बदलाव में अहम भूमिका है बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए नागरिक समाज संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन (जेआरसी) की। संगठन अपने 250 से अधिक सहयोगियों के साथ पुलिस और जिला प्रशासन के जरिए जमीन पर कार्य कर रहा है। जिसके चलते पिछले तीन सालों में पांच लाख से ज्यादा शादियां रोकने में कामयाबी मिली है। संगठन इसी जमीनी स्तर को आगे बढ़ाते हुए भारत सरकार के 2024 में शुरू किए गए बाल विवाह मुक्त भारत अभियान के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा है। साथ ही जेआरसी संसद सदस्य, पंचायत प्रमुख और धर्मगुरु जैसे प्रभावशाली व्यक्तियों को इस मुहिम से जोड़कर और व्यापक बना रहा है।

इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जिस चुप्पी के चलते बाल विवाह जैसी कुप्रथा लगातार जारी थी, अब वह टूटने लगी है। दरअसल, इसके खिलाफ कानून पहले से मौजूद था, लेकिन अब उस पर प्रभावी ढंग से अमल किया जा रहा है और सख्त कार्रवाई भी सुनिश्चित हो रही है। इसी मार्च में झारखंड के पलामू जिले में दूल्हा-दुल्हन के घरवाले और पंडित समेत कुल 54 लोगों पर एफआईआर दर्ज हुई। यानी अब अपराध करने वालों पर कानून का चाबुक चल रहा है। इसके अलावा समाज भी इसके खिलाफ उठ खड़ा हुआ है। पहले जहां बाल विवाह को घर का मामला कहकर टाल दिया जाता था। अब यह सोच बदल रही है। आंगनवाड़ी कार्यकर्ता, शिक्षक, पड़ोसी सब दखल देने लगे हैं। लोग समझ रहे हैं कि यह किसी एक परिवार का नहीं, पूरे समाज का मसला है। यानी जो कभी सोचा भी नहीं जा सकता था, वो अब हो रहा है। और शायद सबसे अहम बात कि अब खुद लड़कियां अपनी शादी रोकने के लिए आगे आ रही हैं। इसी क्रम में पश्चिम बंगाल में एक बच्ची ने अपनी शादी रोकने के लिए स्कूल के ड्रॉपबॉक्स में चिट्ठी डाली। इसी तरह तमिलनाडु में भी एक बच्ची ने खुद चाइल्डलाइन को फोन उठाकर अपने ही घरवालों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। ये बच्चियां अब आवाज उठा रही हैं और अपने अधिकारों के लिए उठ खड़ी हुई हैं।

हालांकि संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया में जितने बाल विवाह होते हैं, उनमें से करीब एक तिहाई अकेले भारत में होते हैं। यानी दुनिया में अगर यह तस्वीर बदलनी है तो उसकी शुरुआत भारत से ही होगी। भारत की कहानी बदले, तभी दुनिया के आंकड़े बदलेंगे। आज दक्षिण एशिया समेत पूरी दुनिया में बाल विवाह की दर जो घट रही है, उसके पीछे कई पहलू हैं जैसे कानून में सुधार, शिक्षा तक पहुंच, गरीबी में कमी, और लगातार चलने वाली जागरूकता की मुहिम। और यह सब कई मोर्चों पर समन्वित रूप से भारत में हो रहा है। अर्थात भारत सिर्फ समस्या का हिस्सा नहीं है बल्कि समाधान का पथ प्रदर्शक है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि लड़ाई खत्म हो गई है। बाल विवाह अभी भी हो रहे हैं खासकर उन जगहों पर जहां गरीबी है, पुरानी सोच है और पढ़ाई-लिखाई की पहुंच कम है।

अभी दुनिया भर में जो तरक्की हुई है, वो भी टिकाऊ नहीं है। युद्ध, जलवायु संकट और कोरोना जैसी महामारियां यह दिखा चुकी हैं कि सालों की मेहनत कितनी जल्दी पलट सकती है। पर समस्या का बने रहना इस बात को नकारता नहीं कि तरक्की हुई है। बल्कि यह बताता है कि जो बदलाव आया है, वो कितना मुश्किल और कितना जरूरी था। अब वक्त है कि दुनिया बाल विवाह को एक नई नजर से देखे। और इसमें भारत से बड़ी सीख कोई नहीं दे सकता जहां सिस्टम इस समस्या से मुंह नहीं मोड़ रहा, बल्कि उसे चुनौती दे रहा है। वो भी उन तरीकों से जो दस साल पहले सोचे भी नहीं जा सकते थे। क्योंकि बदलाव तब नहीं आता जब कोई समस्या खत्म हो जाती है। बदलाव तब आता है जब लोग उसे मानने से इनकार कर देते हैं और भारत में यह इनकार शुरू हो चुका है।



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