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Panama Canal Dispute: होर्मुज के बाद अब पनामा नहर पर भिड़े अमेरिका-चीन, विवाद बढ़ा तो भारत के लिए झटका कैसे?


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oi-Sumit Jha

Panama Canal Dispute: अमेरिका और चीन के बीच अब पनामा नहर (Panama Canal) को लेकर तनाव चरम पर है। ईरान युद्ध के कारण होर्मुज स्ट्रेट पहले ही अशांत है, और अब पनामा नहर के दो रणनीतिक बंदरगाहों बाल्बोआ और क्रिस्टोबाल पर चीनी कंपनी के एकाधिकार को लेकर विवाद छिड़ गया है। पनामा के सुप्रीम कोर्ट द्वारा चीनी कंपनी का अनुबंध रद्द करने के बाद अमेरिका और चीन आमने-सामने हैं।

अमेरिका का आरोप है कि चीन पनामा के झंडे वाले जहाजों को रोककर आर्थिक दबाव बना रहा है, जबकि चीन इसे अमेरिका की साम्राज्यवादी सोच बता रहा है। भारत के लिए भी यह चिंता का विषय है क्योंकि उसके व्यापारिक जहाज इसी शॉर्टकट का इस्तेमाल करते हैं।

Panama Canal Dispute

अमेरिका और चीन के बीच ताजा विवाद की वजह

पनामा के सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में हांगकांग की कंपनी ‘सीके हचिसन’ के दो प्रमुख बंदरगाहों के संचालन करार को असंवैधानिक घोषित कर दिया। इसके बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने आरोप लगाया कि चीन पनामा पर आर्थिक दबाव बना रहा है और जहाजों की आवाजाही में देरी कर रहा है। रूबियो के अनुसार, चीन पनामा में कानून के शासन को कमजोर कर ग्लोबल कॉमर्स को नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर रहा है।

Donald Trump on Panama Canal: पनामा नहर की वैश्विक अहमियत

पनामा नहर करीब 82 किलोमीटर लंबी है जो प्रशांत और अटलांटिक महासागर को जोड़ती है। इसे दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण ‘चोकपॉइंट’ माना जाता है, जहां से वैश्विक व्यापार का 5 फीसदी हिस्सा गुजरता है। यह नहर जहाजों के लिए एक शॉर्टकट है; इसके बिना जहाजों को दक्षिण अमेरिका के नीचे से 15,000 किलोमीटर का लंबा और महंगा रास्ता तय करना पड़ता है। हर साल यहां से लगभग 14,000 जहाज गुजरते हैं।

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भारत के लिए क्यों बढ़ी चिंता?

भारत के लिए पनामा नहर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग है। अमेरिका और प्रशांत क्षेत्रीय देशों के साथ व्यापार के लिए भारतीय जहाज इसी रास्ते का इस्तेमाल करते हैं। अगर यह रास्ता बाधित होता है, तो भारतीय जहाजों को केप हॉर्न का चक्कर लगाकर 13,000 किमी से अधिक की अतिरिक्त दूरी तय करनी होगी। इससे माल ढुलाई की लागत बढ़ेगी, जिससे भारत में आयातित चीजों की कीमतें काफी बढ़ सकती हैं।

पनामा में चीन का बढ़ता दबदबा

चीन अमेरिका के बाद इस नहर का दूसरा सबसे बड़ा उपयोगकर्ता है। नहर के जरिए होने वाले कुल व्यापार में चीन की हिस्सेदारी 21 फीसदी से ज्यादा है। चीन ने वर्षों से यहां के बंदरगाहों और इंफ्रास्ट्रक्चर में भारी निवेश किया है। चीनी कंपनियों का यहां के दो मुख्य बंदरगाहों पर 1997 से कब्जा था, जिसे अब पनामा की अदालत ने रद्द किया है। चीन का यहां होना अमेरिका को रणनीतिक रूप से चुभता रहा है।

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पेट्रोडॉलर बनाम पेट्रोयुआन की जंग

विशेषज्ञों का मानना है कि यह लड़ाई सिर्फ जमीन की नहीं, बल्कि आर्थिक वर्चस्व की भी है। चीन अब कच्चे तेल की खरीद-बिक्री डॉलर के बजाय अपनी मुद्रा ‘युआन’ में करने पर जोर दे रहा है। ईरान के साथ युद्ध के बीच चीन और रूस ईरान को सैन्य और तकनीकी समर्थन दे रहे हैं, जबकि ईरान चीन को भरपूर तेल दे रहा है। यह पेट्रोडॉलर को पेट्रोयुआन से रिप्लेस करने की एक बड़ी भू-राजनीतिक चाल मानी जा रही है।

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डोनाल्ड ट्रंप का कड़ा रुख

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2025 में पद संभालते ही दावा किया था कि पनामा नहर पर असल में चीन का नियंत्रण है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि अमेरिका इसे वापस लेने के लिए कदम उठाएगा। ट्रंप ने ईरान युद्ध का हवाला देकर अपना चीन दौरा भी टाल दिया है। अमेरिका की मंशा साफ है कि वह इस रणनीतिक मार्ग पर चीन के किसी भी तरह के नियंत्रण को बर्दाश्त नहीं करेगा, ताकि पश्चिमी देशों का प्रभाव बना रहे।



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