भारत ने इलेक्ट्रॉनिक्स बनाने में जो रफ्तार पकड़ी है, अब उसे उसी ताक से नए प्रोडक्ट गढ़ने की तैयारी करनी होगी। वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा- जब तक हम सिर्फ बनाने वाले नहीं, बल्कि नया रचने वाले बनेंगे, तब तक नेट इम्पोर्टर से नेट एक्सपोर्टर बनने का सपना पूरा नहीं होगा। चिंतन शिविर 2026 ‘इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट विजन’ में दिए इस बयान ने पूरे सेक्टर को एक नई सोच दे दी है। आइए, इसी सोच को आसान भाषा में समझते हैं।
क्यों इनोवेशन पर इतना जोर दे रहे हैं वाणिज्य सचिव?
राजेश अग्रवाल का मानना है कि उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ एक ‘पूरा इनोवेशन इकोसिस्टम’ खड़ा करना होगा। उन्होंने कहा, “हमें उत्पादन के इकोसिस्टम के समानांतर एक इनोवेशन का इकोसिस्टम भी तैयार करना होगा, ताकि हम उत्पादों के उत्पादक ही नहीं, नए उत्पादों के रचयिता भी बनें। तभी हम नेट आयातक से नेट निर्यातक बनने की छलांग लगा पाएंगे।” सीधा मतलब- मौजूदा चीजें असेंबल करके बेचने से काम नहीं चलेगा, ग्लोबल वैल्यू चेन में ऊपर चढ़ने के लिए अपनी डिजाइन और अपनी टेक्नोलॉजी चाहिए।
क्या कहते हैं इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर के ताजा आंकड़े?
इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अनुसार:
- इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग ₹1.9 लाख करोड़ (2014-15) से लगभग छह गुना बढ़कर ₹11.32 लाख करोड़ (2024-25) हो गई।
- इसी दौरान निर्यात आठ गुना उछलकर ₹3.26 लाख करोड़ पहुंच गया।
- इलेक्ट्रॉनिक्स अब देश की तीसरी सबसे बड़ी निर्यात कैटेगरी बन चुकी है।
यानी बुनियाद मजबूत है, अब बारी है उस पर नवाचार की मंजिलें खड़ी करने की।
सरकार ने मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए कौन सी स्कीमें चलाई हैं?
इस उछाल के पीछे कई सरकारी पहलों का हाथ है:
- पीएलआई स्कीम (इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग): बड़े पैमाने पर उत्पादन को प्रोत्साहन।
- पीएलआई स्कीम (आईटी हार्डवेयर): लैपटॉप, टैबलेट आदि की घरेलू मैन्युफैक्चरिंग पर जोर।
- इलेक्ट्रॉनिक्स कम्पोनेंट्स मैन्युफैक्चरिंग स्कीम (ईसीएमएस): पुर्जों का देसी उत्पादन बढ़ाने के लिए।
- सेमीकॉन इंडिया प्रोग्राम: चिप निर्माण की गहरी जड़ें जमाने का लक्ष्य।
ये सब आत्मनिर्भर भारत और मेक इन इंडिया की सोच को जमीन पर उतार रही हैं।
सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में कितनी प्रगति हुई है?
सेमीकंडक्टर को आत्मनिर्भरता के मामले में सबसे महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
– अब तक 10 सेमीकंडक्टर यूनिट्स को मंजूरी मिल चुकी है, जिनमें कुल 1.6 लाख करोड़ रुपये का निवेश होगा।
– वहीं, डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम और चिप्स टू स्टार्टअप्स जैसे कार्यक्रम घरेलू चिप डिजाइन और स्टार्टअप इनोवेशन को हवा दे रहे हैं।
आगे की राह क्या होगी?
अग्रवाल के बयान का साफ़ इशारा है कि सरकार की अगली बड़ी प्राथमिकता प्रॉडक्ट डेवलपमेंट और डिजाइन होगी। उत्पादन बढ़ाने की रफ़्तार को बनाए रखते हुए, ऐसा माहौल तैयार करना है जहां भारतीय कंपनियां दुनिया के लिए नई इलेक्ट्रॉनिक चीजें ईजाद करें- तभी शुद्ध आयात या नेट इम्पोर्टर का टैग हटेगा और भारत ग्लोबल इलेक्ट्रॉनिक्स इंडस्ट्री में एक बड़ी ताकत बनकर उभरेगा।



