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7 Most Dangerous Mountain in World: इसमें कोई संदेह नहीं है माउंट एवरेस्ट दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है जहां चढ़ने के लिए जिंदगी और मौत को एक साथ हाथ में लेना पड़ता है. लेकिन जब खतरनाक पहाड़ों की बात आती है तो इन 7 पर्वत चोटियों के सामने माउंट एवरेस्ट बच्चा लगता है. के 2, अन्नपुर्णा, कंचनजंघा जैसे पहाड़ों पर चढ़ना कलेजा को फाड़ देने वाला साहसिक कारनामा है. यहां की सीधी और फिसलन भरी खड़ी चट्टानों से गुजरने में हर पल सीने को चीर देने वाली बर्फीली हवाएं चलती है. कब हिमस्खलन होकर मौत दावत दे दें किसी को पता नहीं होता. नेपाली शेरपा 8 हजार मीटर से ऊंची सभी 14 पर्वत श्रृंखलाओं को कई बार फतह कर चुके हैं लेकिन इस बार ब्रॉड पीक चोटी फतह में वे भी फंस गए हैं. ऐसे में हम यहां आपको 7 डेंजरस पहाड़ों के बारे में बता रहें हैं.
हर साल 700 से 1,000 लोग माउंट एवरेस्ट फतह करने की कोशिश करते हैं लेकिन इनमें से आधे लोग ही सफल होते हैं. इन आधे लोगों में दोगुना वे लोग होते हैं जो विदेशी पर्वतारोहियों की मदद के लिए जाते हैं. यानी ये नेपाली शेरपा होते हैं जो अक्सर माउंट एवरेस्ट पर इनके साथ जाते हैं. हर विदेशी पर्वतारोहियों के लिए कम से कम 1 या 2 गाइड होते हैं जो रास्ता बनाते हैं, टेंट लगाते हैं और भारी सामान उठाते हैं. यानी शिखर पर पहुंचने वाले आधे से ज्यादा लोग नेपाली शेरपा ही होते हैं. ये तो हो गई माउंट एवरेस्ट की बात. लेकिन हम बताएंगे कि भले ही इन चोटियों की ऊंचाई माउंट एवरेस्ट से कम हो लेकिन ये 7 चोटियां भी बेहद डेंजरस हैं जिनपर सिर्फ कलेजा वाले लोग ही फतह कर पाते हैं. Photo : PTI Photo/Chungba Sherpa
K2 गॉडविन ऑस्टिन -माउंट एवरेस्ट के बाद काराकोरम श्रेणी में सबसे ऊंची चोटी है के2 गॉडविन ऑस्टिन. इसकी ऊंचाई 8,611 मीटर है. काराकोरम के खतरनाक होने का प्रमाण इसी बात से लगा सकते हैं कि नोर्थ पोल और साउथ पोल के बाद धरती पर सबसे बड़े ग्लेशियर इसी रेंज में है. इसी श्रृंखला में सियाचिन ग्लेशियर है. के2 की चढ़ाई एवरेस्ट से भी अधिक सीधी और चट्टानी है. यहां का मौसम बेहद खतरनाक हैं. यहां हवाएं अचानक से कब तेज हो जाती हैं और कब बर्फीले तूफान आ जाते हैं, किसी को पता नहीं. इसके रास्ते में ग्लेशियर है जिसकी वजह से रास्ते में गिरने वाली बर्फ की बड़ी चट्टानें बेहद जानलेवा हैं. इन खतरनाक वजहों से के2 को सैवेज माउंटेन कहा जाता है यानी बेहद निर्दय पहाड़. यहां मुश्किल से 80 से 150 पर्वतारोही ही चढ़ने का प्रयास करते हैं लेकिन 50-60 ही सफल हो पाते हैं. Photo-Instagram/FullCyclePublications
कंचनजंगा-कंचनजंघा की चोटी भारत के सिक्किम में स्थित है. यह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी ऊंची चोटी है. यह भी कारकोरम श्रेणी में ही स्थित है. यह चोटी नेपाल की सीमा पर स्थित है. इस पर चढ़ाई बेहद दुर्गम और तकनीकी रूप से कठिन मानी जाती है. यहां का मौसम भी पल-पल में बदलता है और अत्यधिक हिमस्खलन का खतरा हमेशा बना रहता है. इस चोटी पर चढ़ने में अधिकांश लोगों की मौत हो जाती है. यहां चढ़ने का मृत्यु दर काफी अधिक है, जिसके कारण बहुत कम पर्वतारोही यहाँ जाने का जोखिम उठाते हैं. औसतन हर साल केवल 20 से 40 लोग ही इसके शिखर तक पहुंच पाते हैं. स्थानीय सिक्किमवासियों की धार्मिक मान्यताओं और आस्था के सम्मान में पर्वतारोही शिखर के बिल्कुल अंतिम बिंदु पर कदम न रखकर उससे कुछ फीट पहले ही रुक जाते हैं.
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ल्होत्से -यह दुनिया की चौथी सबसे ऊंची चोटी है. इसकी ऊंचाई समुंद्र तल से 8,516 मीटर है. इसका उत्तरी हिस्सा और शिखर तिब्बत में पड़ता है और दक्षिणी फेस नेपाल में. ल्हाोत्से माउंट एवरेस्ट के बिल्कुल बगल में नेपाल और तिब्बत की सीमा पर स्थित है. इसका दक्षिणी चेहरा पर्वतारोहण की दुनिया में सबसे खतरनाक और सीधी खड़ी चट्टानों में से एक माना जाता है. ल्हाोत्से का अधिकांश रास्ता एवरेस्ट के रास्ते में ही है. एवरेस्ट के बेस कैंप और साउथ कोल में सबको जाना ही पड़ता है तभी वह ल्होत्से पहुंच पाता है. इसलिए जो लोग एवरेस्ट फतह करते हैं उनमें कई लोग साथ ही साथ ल्होत्से भी फतह कर लेते हैं. लेकिन यहां चढ़ना ज्यादा खतरनाक है इसलिए अनुकूल मौसम में हर साल लगभग 70 से 120 पर्वतारोही इसे फतह करते हैं. इसकी मुख्य विशेषता ल्हाोत्से कूपर नामक एक संकरा बर्फीला नाला है, जहां बर्फ और पत्थरों के गिरने का जानलेवा जोखिम रहता है. Photo-Instagram
मकालू-नेपाल और चीन सीमा पर स्थित मकालू दुनिया की पांचवीं सबसे ऊंची चोटी है. इसकी ऊंचाई 8,485 मीटर है. अपने चार भुजाओं वाले पिरामिड जैसे अनोखे आकार के कारण यह दूर से ही पहचानी जाती है. मकालू को दुनिया के सबसे कठिन पर्वतों में गिना जाता है क्योंकि इसके अंतिम हिस्से पर केवल बर्फ ही नहीं, बल्कि बेहद तीखी और फिसलन भरी चट्टानों पर चढ़ाई करनी पड़ती है. यहां की बर्फीली तेज़ हवाएं पर्वतारोहियों के दिल की अग्निपरीक्षा लेती है. अत्यधिक कठिनाई के कारण यहाँ बहुत कम व्यावसायिक अभियान जाते हैं और हर साल औसतन केवल 30 से 50 लोग ही इस पर सफलता प्राप्त कर पाते हैं. Photo: Instagrame/Aklakur Rahman
धौलागिरी I-धौलागिरी पर्वत की चोटी की ऊंचाई 8,167 मीटर है. मध्य नेपाल में स्थित धौलागिरी I दुनिया की सातवीं सबसे ऊंची चोटी है. संस्कृत में धौलागिरी का अर्थ सफ़ेद सुंदर पर्वत होता है. यह पर्वत दूर से जितना सुंदर दिखता है, इसकी चढ़ाई उतनी ही अप्रत्याशित और भयंकर है. यहां भयंकर बर्फीले तूफान और अचानक हिमस्खलन आते हैं. इसके उत्तर-पूर्वी रिज का रास्ता बेहद खतरनाक दरारों से भरा हुआ है. यहां चढ़ना इतना ज्यादा जोखिम है कि चोटी पर पहुंचने की सफलता दर काफी कम है. यही कारण है कि हर साल केवल 20 से 40 पर्वतारोही ही इसे फतह करने में कामयाब होते हैं.
नंगा पर्वत -नंगा पर्वत दुनिया की 9वीं सबसे ऊंची और सबसे खतरनाक चोटियों में से एक है. इसकी सबसे आक्रामक रूप इसका रुपाल फेस है, जो 4,600 मीटर ऊंची दुनिया की सबसे बड़ी और सीधी चट्टानी दीवार है. इस पर्वत को देखकर लगभग सौ फीसदी लोग चढ़ने के बारे में कल्पना भी नहीं कर सकते. हर पल यहां मौसम बेहद अप्रत्याशित है. तेज बर्फीले तूफान आते हैं और अचानक विशाल हिमस्खलन होते हैं. इसकी अत्यधिक ढलान और तकनीकी कठिनाई के कारण यहां कई पर्वतारोहियों ने अपनी जान गंवाई है. इसी भयंकर और जानलेवा इतिहास के कारण इसे किलर माउंटेनके नाम से भी जाना जाता है. इस पर्वत पर हर साल औसतन 10 से 20 पर्वतारोही ही सफलता प्राप्त कर पाते हैं. कई सालों में तो यहां एक भी पर्वतारोही शिखर तक नहीं पहुंच पाता.
अन्नपूर्णा I-अन्नपूर्णा I चोटी नेपाल में स्थित है. अन्नपूर्णा I दुनिया की 10वीं सबसे ऊंची चोटी है और इसे पर्वतारोहण की दुनिया में सबसे घातक माना जाता है. इस पर्वत पर यहां बार-बार होने वाले भयंकर हिमस्खलन और बर्फ़ीली दरारें किसी का भी कलेजा तोड़ सकता है. इस पर चढ़ना इसलिए बेहद मुश्किल है क्योंकि इसके मुख्य रास्तों पर बर्फ की विशाल चट्टानें गिरती रहती हैं और चढ़ाई का ढांचा अत्यधिक अस्थिर है. सभी आठ-हज़ारी पर्वतों में अन्नपूर्णा I की मृत्यु दर सबसे अधिक है. यहां का भयानक मौसम और लगातार गिरती बर्फ पर्वतारोहियों को संभलने का मौका तक नहीं देती, जिससे यह दुनिया के सबसे जोखिम भरे पर्वतों में शामिल है. इस पर्वत पर चढ़ने में 20 से 40 पर्वतारोही सफलता प्राप्त करते हैं. अत्यधिक हिमस्खलन के कारण पर्वतारोही केवल अप्रैल-मई के बेहद छोटे वेदर विंडो का इंतजार करते हैं.



