एआई, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कहें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यह केवल एक नया सॉफ्टवेयर या एप नहीं है, बल्कि बिजली और इंटरनेट की तरह एक ‘सुपरसाइकिल’ है। यह अगले 30 से 50 वर्षों के लिए वैश्विक अर्थव्यवस्था के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह से बदलने जा रहा है। अक्सर लोग यह समझ लेते हैं कि हम एआई के ‘एप्लीकेशन’ (इस्तेमाल) के दौर में पहुंच चुके हैं, लेकिन हकीकत यह है कि अभी इसका सिर्फ बुनियादी ढांचा तैयार किया जा रहा है। आइए समझते हैं कि एआई के बुनियादी ढांचे के पर्दे के पीछे असल में कौन सा आर्थिक और भू-राजनीतिक खेल चल रहा है।
सवाल : क्या एआई की रेस सिर्फ बेहतरीन सॉफ्टवेयर बनाने तक सीमित है?
जवाब: बिल्कुल नहीं। यह रेस असल में एक फिजिकल सप्लाई चेन (भौतिक आपूर्ति शृंखला) की प्रतियोगिता है। मौजूदा दौर में सबसे ज्यादा मुनाफा उन कंपनियों को हो रहा है जो इस बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए जरूरी पुर्जे (जैसे चिप्स और मशीनें) बना रही हैं। एनवीडिया और टीएसएमसी जैसी कंपनियां इसी वजह से भारी मुनाफा कमा रही हैं।
सवाल: एआई के विस्तार में समय-समय पर कौन सी बड़ी रुकावटें सामने आई हैं?
जवाब: दुनिया में एआई से जुड़ी रुकावटें लगातार अपना रूप बदल रही हैं। इसे ऐसे समझिए-
- 2022: उस समय सबसे बड़ी चुनौती एडवांस चिप पैकेजिंग (CoWoS) की थी, जिसे पूंजी का इस्तेमाल कर सुलझा लिया गया।
- 2023-2024: इस दौरान पावर (बिजली) और डेटा सेंटर्स की कमी सामने आई। इसे गैस प्लांट और सोलर-बैटरी जैसे विकल्पों के जरिए सुलझाया जा रहा है।
- 2025-2027 (वर्तमान चुनौती): इस समय असली संकट चिप बनाने वाली फैक्ट्रियों (Fab) और मेमोरी की कमी का है।
- 2028-2030: यह सबसे बड़ी और पार न की जा सकने वाली रुकावट होगी, जो एएसएमल कंपनी की मशीनें यानी ईयूवी टूल्स से जुड़ी हैं।