ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने गुरुवार को कहा कि भारत को अमेरिका के दबाव में आकर यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) से जुड़ी अपनी नीतियों में बदलाव नहीं करना चाहिए। देश को प्रतिस्पर्धा, नीतिगत स्वायत्तता और अपनी भुगतान व्यवस्था की दीर्घकालिक मजबूती की रक्षा करनी चाहिए।
इससे पहले गुरुवार को लोकसभा ने भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 में संशोधन संबंधी विधेयक पारित किया। इसके तहत सरकार को बैंकों और अन्य सेवा प्रदाताओं को यूपीआई तथा अधिसूचित अन्य इलेक्ट्रॉनिक भुगतान माध्यमों पर शुल्क लगाने की अनुमति देने का अधिकार मिलेगा।
जीटीआरआई ने कहा कि फिलहाल बैंक और भुगतान प्रणाली से जुड़े सेवा प्रदाता यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड जैसे निर्धारित भुगतान माध्यमों पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ग्राहकों से कोई शुल्क नहीं ले सकते। थिंक टैंक के अनुसार, शून्य मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) नीति ने यूपीआई के विस्तार में अहम भूमिका निभाई है। इसकी वजह से उपभोक्ता, छोटे दुकानदार और रेहड़ी-पटरी वाले बिना किसी लेनदेन शुल्क के भुगतान कर और प्राप्त कर सके हैं।
हालांकि, जीटीआरआई ने कहा कि बैंकों, भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम (एनपीसीआई) और भुगतान कंपनियों को साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, सर्वर, विवाद निपटान और भुगतान प्रणाली के विस्तार पर लगातार निवेश करना पड़ता है। जीटीआरआई ने कहा, “इसलिए व्यवस्था के लिए टिकाऊ वित्तीय मॉडल की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इसके लिए सभी व्यापारियों पर सामान्य शुल्क लगाना जरूरी नहीं है।”
उसने कहा, “इसके विकल्पों में लक्षित बजटीय सहायता, सरकारी प्रोत्साहन, बड़े व्यावसायिक लेनदेन पर शुल्क, वित्तीय सेवाओं से क्रॉस-सब्सिडी और केवल अधिक कारोबार वाले व्यापारियों पर सीमित शुल्क जैसे उपाय शामिल हो सकते हैं।” जीटीआरआई का दावा है कि यह विधायी बदलाव ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका भारत की घरेलू डिजिटल भुगतान व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है। अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) की वर्ष 2026 की ‘नेशनल ट्रेड एस्टीमेट रिपोर्ट ऑन फॉरेन ट्रेड बैरियर्स’ में ब्राजील के पिक्स और भारत के यूपीआई तथा रुपे ढांचे की आलोचना की गई है।



