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Disha Salian Case: क्या होती है क्रिमिनल रिट याचिका? 6 साल बाद दिशा सालियान केस को CBI ने क्यों खोला?


बॉम्बे हाईकोर्ट के आदेश के बाद सीबीआई ने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की पूर्व मैनेजर दिशा सालियान की संदिग्ध मौत के मामले में एफआईआर दर्ज कर ली है. सीबीआई ने यह एफआईआर हत्या, गैंगरेप और सबूत मिटाने के आपराधिक साजिश जैसी गंभीर धाराओं के तहत दर्ज की है. सीबीआई ने यह एफआईआर बॉम्बे हाईकोर्ट में दाखिल एक क्रिमिनल रिट याचिका के आधार पर किया है. दिशा सालियान के पिता बॉम्बे हाईकोर्ट में एक क्रिमिनल रिट याचिका दायर किया था. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि इस एफआईआर में नाम होने मात्र से राजनेता, बॉलीवुड एक्टर, आईपीएस अधिकारी गिरफ्तार हो जाएंगे? जानें किन धाराओं में एफआईर दर्ज हुई है और उस एफआईआर में क्या-क्या लिखा है.

दिशा सालियान की मौत के करीब छह साल बाद मामले में एक नया कानूनी अध्याय शुरू हो गया है. सीबीआई की स्पेशल क्राइम-II यूनिट नई दिल्ली ने 13 सितंबर 2026 को नियमित FIR दर्ज की है. इस एफआईआर में IPC की धारा 120-B के साथ 376-D, 302, 201, 217 और 218 तथा संबंधित सब्सटेंटिव ऑफेंसेज का उल्लेख है. एफआईआर के मुताबिक मामला 8 और 9 जून 2020 की दरम्यानी रात मुंबई के मालवणी इलाके स्थित Regent Galaxy Apartment के फ्लैट नंबर 1202 से जुड़ा है.

किन-किन धाराओं में एफआईआर दर्ज हुआ?

यह FIR बॉम्बे हाईकोर्ट के 2 सितंबर 2026 के आदेश के बाद दर्ज की गई है. हाईकोर्ट के निर्देश के बाद दिशा सालियान के पिता सतीश ईश्वर सालियान का बयान 11 सितंबर 2026 को दर्ज किया गया, जिसमें उनकी ओर से उनकी बेटी की मौत को आत्महत्या के बजाय कथित गैंगरेप और हत्या के रूप में जांचने की मांग की गई. एफआईआर में इसी बयान में सामने आए आरोपों को जांच का आधार बनाया गया है. अब सवाल उठता है कि इतने साल बाद सीबीआई ने क्यों दर्ज की एफआईआर?

दिशा सालियान केस की सीबीआई जांच शुरू.

क्रिमिनल रिट याचिका क्या होती है?

दिशा सालियान के पिता सतीश ईश्वर सालियान ने बॉम्बे हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिट याचिका दायर की थी. बता दें कि जब किसी आपराधिक मामले में पुलिस या जांच एजेंसियां निष्पक्ष जांच करने में विफल रहती हैं, प्राथमिक सूचना रिपोर्ट यानी एफआईआर दर्ज करने से मना करती हैं या जांच में गंभीर लापरवाही बरतती हैं, तो पीड़ित या उसका परिवार संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालय (High Court) में क्रिमिनल रिट याचिका दाखिल करता है. इस याचिका के जरिए अदालत से निष्पक्ष जांच, एफआईआर दर्ज कराने या जांच एजेंसी जैसे मुंबई पुलिस से CBI बदलने की गुहार लगाई जाती है. दिशा सालियान के पिता सतीश सालियान ने भी बॉम्बे हाई कोर्ट में यही याचिका दाखिल कर आरोप लगाया था कि मुंबई पुलिस ने मामले को सही तरीके से नहीं जांचा और केवल दुर्घटना-आत्महत्या (Accidental Death Report- ADR) की धारा में केस को दबाए रखा.

CBI ने हत्या और गैंगरेप की संगीन धाराओं में FIR क्यों दर्ज की?

बॉम्बे हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस की जांच पर कड़े सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि 6 साल बीत जाने के बाद भी एफआईआर दर्ज न करना और सिर्फ ADR के तहत जांच चलाना कानूनी रूप से अपर्याप्त है. अदालत ने पाया कि मामले में कई ऐसे पहलू और विसंगतियां हैं, जिनकी निष्पक्ष जांच होनी अनिवार्य है. इसलिए सीबीआई ने धारा 376(D)- सामूहिक दुष्कर्म (Gang Rape), धारा 302- हत्या (Murder), धारा 120-B आपराधिक षड्यंत्र (Criminal Conspiracy), धारा 201-साक्ष्य मिटाना और गलत जानकारी देना.

आदित्य ठाकरे (फाइल फोटो)

FIR में किन लोगों के नाम हैं?

FIR में कई व्यक्तियों के नाम लिए गए हैं. महत्वपूर्ण बात यह है कि इन लोगों की भूमिका की जांच की आवश्यकता बताई गई है. इससे यह निष्कर्ष नहीं माना जा सकता कि सभी लोग आरोपी या अपराधी सिद्ध हो चुके हैं.

  1. आदित्य ठाकरे
  2. रोहन रॉय
  3. डिनो मोरिया
  4. सूरज पंचोली
  5. आदित्य ठाकरे के बॉडीगार्ड्स
  6. रिया चक्रवर्ती
  7. शोविक चक्रवर्ती
  8. सचिन वाजे
  9. परमबीर सिंह
  10. DCP विशाल ठाकुर
  11. उद्धव ठाकरे
  12. अनिल देशमुख
  13. API अशोक देवदहे
  14. PI जगदेव कलापाड़
  15. PI शैलेंद्र नागरकर
  16. PI चिमाजी अढाव
  17. PI अर्जुन राजने
  18. मालवणी पुलिस स्टेशन के संबंधित अधिकारी
  19. पोस्टमार्टम में देरी से जुड़े डॉक्टर और कर्मचारी
  20. डॉ. संजय जाधव
  21. कालिना FSL के संबंधित अधिकारी, जिनमें N.P. भाले का नाम भी है
  22. Regent Galaxy के सुरक्षा गार्ड सुशील कुमार यादव और शिवमुराद गौतम उर्फ मुन्ना
  23. प्रीति राणे
  24. प्रवीण राणे
  25. अंकिता साटुर
  26. इंद्रनील वैद्य
  27. दीप अजमेरा
  28. हिमांशु शिखारे
  29. रेशा पाडवाल
  30. सतवंत सिंह
  31. नावेद मुजावर
  32. प्रियेश राणे
  33. इसके अलावा FIR में SIT के वरिष्ठ सदस्यों, संबंधित वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और अन्य अज्ञात व्यक्तियों की भूमिका की भी जांच की बात कही गई है.

FIR का सबसे बड़ा आधार क्या है?

सतीश सालियान के बयान में सबसे महत्वपूर्ण दावा यह है कि उनकी बेटी की मौत को शुरू से आत्महत्या बताया गया, जबकि उनके मुताबिक परिस्थितियां संदिग्ध थीं. FIR में दर्ज बयान के अनुसार, दिशा 4 जून 2020 को अपने घर से निकली थीं. उन्होंने परिवार को बताया था कि वह अपने मंगेतर रोहन रॉय के साथ विज्ञापन शूट से संबंधित काम के लिए जा रही हैं. 6 जून को उन्होंने अपनी मां से बातचीत भी की थी. लेकिन 7 जून से परिवार से उनका सीधे संपर्क बंद हो गया और फोन पर रोहन रॉय के जवाब देने का उल्लेख FIR में है. इसके बाद 9 जून की सुबह परिवार को उनकी मौत की सूचना मिली. पिता का कहना है कि शुरुआत में उन्हें उनकी बेटी का शव देखने तक नहीं दिया गया और बाद में तस्वीरें दिखाए जाने पर उन्होंने शरीर पर दिखाई देने वाली चोटों और अन्य परिस्थितियों को लेकर सवाल उठाए.

जिया खान केस में भी सूरज पंचोली का नाम आया था लेकिन वह बड़ी हो गए.

CCTV को लेकर क्या सवाल उठाया गया है?

FIR में CCTV फुटेज को जांच का महत्वपूर्ण आधार बनाने की मांग की गई है. शिकायतकर्ता के बयान के मुताबिक CCTV में दिशा को 8 जून की रात करीब 8:15 बजे फ्लैट नंबर 1101 की दिशा में जाते हुए दिखाए जाने का दावा है. इसके अलावा लगभग 12:55 बजे रोहन रॉय, सुरक्षा गार्ड और पुलिसकर्मियों के लिफ्ट से जाने का उल्लेख है. FIR में कहा गया है कि यह घटनाक्रम उस कथित कहानी से मेल नहीं खाता जिसमें दिशा के फ्लैट में रहने और रात करीब 1:20 बजे छलांग लगाने की बात कही गई थी. कानूनी तौर पर अब जांच का सवाल यह होगा कि CCTV फुटेज असली और पूर्ण है या नहीं, उसका chain of custody क्या है और उसमें दिखाई देने वाले व्यक्तियों की पहचान तथा गतिविधियों की स्वतंत्र पुष्टि होती है या नहीं.

शव, कपड़े, प्राइवेट पार्ट्स और पोस्टमार्टम को लेकर भी FIR में सवाल

FIR में शव की स्थिति, कपड़ों और पोस्टमार्टम रिकॉर्ड में कथित विरोधाभासों का उल्लेख किया गया है. शिकायतकर्ता के मुताबिक अलग-अलग रिकॉर्ड में शव के कपड़ों को लेकर अलग विवरण सामने आते हैं. इसी तरह शव के कथित landing position को लेकर भी सवाल उठाया गया है. FIR में दावा है कि शव इमारत से करीब 25 फीट दूर मिला था, जबकि कथित scene reconstruction/dummy test में ऐसी landing दोहराई नहीं जा सकी. इसके साथ ही FIR में यह आरोप भी है कि reconstruction की रिकॉर्डिंग या वीडियोग्राफी जांच रिकॉर्ड से गायब है. यहां जांच के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज original scene documentation, पंचनामा, photographs, CCTV, forensic reconstruction और संबंधित डिजिटल रिकॉर्ड होंगे.

मुंबई पुलिस (फाइल फोटो)

सबसे संवेदनशील मुद्दा: Vaginal और Anal Swabs

FIR का एक बेहद गंभीर हिस्सा कथित vaginal और anal swabs से जुड़ा है. शिकायत में कहा गया है कि मेडिकल और पुलिस रिकॉर्ड में swabs लिए जाने तथा उन्हें forensic examination के लिए भेजे जाने का उल्लेख था. FIR में PSI अशोक देवदहे के 12 जून और 16 जून 2020 के communications तथा DCP विशाल ठाकुर के 3 अगस्त 2020 के communication का हवाला दिया गया है. इसके बाद FIR के अनुसार 28 अगस्त 2020 की एक रिपोर्ट सामने आई, जो swabs की forensic report के बजाय smear slides से संबंधित थी. पोस्टमार्टम डॉक्टर की ओर से बाद में यह स्पष्टीकरण दिए जाने का भी उल्लेख है कि Form No. 2 में swab का उल्लेख गलती से हुआ था और वास्तव में केवल smears लिए गए थे. लेकिन FIR में दावा है कि 2023 में SIT के सामने दिए गए PSI अशोक देवदहे के बयान में फिर vaginal और anal swabs लिए जाने तथा FSL भेजे जाने की बात कही गई.

मोबाइल फोन और डिजिटल सबूत भी जांच के केंद्र में

FIR में दिशा के मोबाइल फोन को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं. इसमें अलग-अलग बयानों और मीडिया रिपोर्टों के आधार पर यह सवाल उठाया गया है कि पुलिस ने फोन कब कब्जे में लिया, उसकी seizure और forensic examination कैसे हुई तथा बाद में फोन के डेटा के साथ क्या हुआ? शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि मोबाइल डेटा और communications को access, delete या tamper करके evidentiary trail को नुकसान पहुंचाया गया है. कानूनी रूप से यह हिस्सा बेहद महत्वपूर्ण है. क्योंकि आज की जांच में फोन extraction, cloud backup, deleted data recovery, metadata, location information, call records और digital chain of custody किसी भी निष्कर्ष को मजबूत या कमजोर कर सकते हैं.

FIR में एक और बड़ा आरोप- जांच को प्रभावित करने का

FIR में केवल कथित हत्या या गैंगरेप की बात नहीं है. इसमें आरोप लगाया गया है कि अपराध के बाद evidence suppression, destruction या fabrication हुई और पुलिस रिकॉर्ड में भी कथित तौर पर हेरफेर किया गया. इसी कारण FIR में IPC की धारा 201 के साथ-साथ 217 और 218 जैसी धाराएं भी शामिल की गई हैं.

दिशा सालियान केस में दर्ज एफआईआर में उद्धव और आदित्य ठाकरे के भी नाम हैं. फाइल फोटो

CBI के सामने अब दो समानांतर सवाल

पहला: क्या दिशा सालियान की मौत वास्तव में हत्या और उससे पहले गैंगरेप का परिणाम थी?

दूसरा: यदि ऐसा था तो क्या बाद में सबूत दबाने, गलत रिकॉर्ड तैयार करने या आरोपियों को बचाने की कोई संगठित कोशिश हुई?

क्या FIR में नाम आना गिरफ्तारी या दोष साबित होने के बराबर है?

नहीं. यह सबसे महत्वपूर्ण कानूनी सावधानी है. FIR में किसी व्यक्ति का नाम आना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता. इस मामले में तो FIR की भाषा स्वयं कई व्यक्तियों के संबंध में यह कहती है कि उनकी roles require investigation यानी उनकी भूमिका की जांच की आवश्यकता है. इसलिए फिलहाल कानूनी स्थिति यह है कि CBI ने आरोपों और उपलब्ध प्रारंभिक सामग्री के आधार पर नियमित मामला दर्ज किया है. अब जांच एजेंसी को यह तय करना होगा कि किस व्यक्ति के खिलाफ प्रथमदृष्टया पर्याप्त साक्ष्य है और किसकी भूमिका संदिग्ध होने के बावजूद अपराध से जुड़ती नहीं है.

CBI के सामने सबसे बड़े 7 कानूनी सवाल

1. मृत्यु का वास्तविक कारण क्या था?
क्या उपलब्ध मेडिकल और फॉरेंसिक साक्ष्य आत्महत्या की ओर जाते हैं या किसी अन्य तरीके से मृत्यु की ओर?

2. क्या sexual assault के पर्याप्त वैज्ञानिक साक्ष्य हैं?
Swabs, smears, DNA और FSL records की पूरी chain की जांच निर्णायक हो सकती है.

3. CCTV की authenticity क्या है?
Original DVR/NVR, metadata और complete footage की forensic verification महत्वपूर्ण होगी.

4. क्या मोबाइल डेटा से घटनाक्रम की पुष्टि होती है?
Call records, location data और deleted communications की forensic recovery अहम हो सकती है.

5. क्या evidence से छेड़छाड़ हुई?
यदि रिकॉर्ड बदले, गायब या नष्ट किए गए, तो यह अलग आपराधिक जिम्मेदारी का आधार बन सकता है.

6. क्या किसी लोक सेवक ने जानबूझकर गलत रिकॉर्ड बनाया या किसी को बचाया?
यहीं IPC 217 और 218 की भूमिका सामने आती है.

7. क्या सभी कथित आरोपियों के बीच criminal conspiracy साबित होती है?
धारा 120-B के लिए केवल लोगों का एक-दूसरे से संपर्क या परिचय पर्याप्त नहीं होगा; अभियोजन को आपराधिक उद्देश्य और उस उद्देश्य को आगे बढ़ाने वाले कृत्यों से साजिश की कड़ी स्थापित करनी होगी.

एक्टर सूरज पंचोली पहले भी विवादों में रहे हैं. (फोटो साभार: Instagram@soorajpancholi)

दिशा सालियान और सुशांत सिंह राजपूत की मौत की टाइमलाइन

दिशा सालियान की संदिग्ध मौत
8-9 जून 2020 की रात- दिशा सालियान मुंबई के मलाड स्थित ‘रीजेंट गैलेक्सी’ इमारत की 12वीं मंजिल स्थित फ्लैट की खिड़की से नीचे गिरी पाई गईं. मुंबई पुलिस ने इसे दुर्घटना या आत्महत्या बताकर केवल एडीआर (Accidental Death Report) दर्ज किया.

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत
14 जून 2020 (6 दिन बाद)
दिशा की मौत के ठीक 6 दिन बाद बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत अपने बांद्रा स्थित फ्लैट में मृत पाए गए. दोनों घटनाओं के कम समय के अंतराल के कारण साजिश और किसी गहरे कनेक्शन की आशंका जताई जाने लगी.

मीडिया कवरेज, एसआईटी और पिता के बयान
2020 – 2025
शुरुआत में दिशा के पिता ने पुलिस को दिए बयान में कोई साजिश नहीं जताई थी. लेकिन बाद में उन्होंने आरोप लगाया कि उनकी बेटी के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसकी हत्या की गई और सबूतों को मिटाया गया.

बॉम्बे हाई कोर्ट का ऐतिहासिक आदेश
2 सितंबर 2026
हाई कोर्ट ने मुंबई पुलिस की ढिलाई पर सवाल उठाते हुए सीबीआई को सीधे FIR दर्ज कर जांच शुरू करने का आदेश दिया.

सीबीआई की रेगुलर एफआईआर दर्ज
13-14 सितंबर 2026
दिशा के पिता के विस्तृत बयान दर्ज करने के बाद सीबीआई ने सामूहिक दुष्कर्म, हत्या और साजिश की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की.

दिशा सालियान केस में 13 सितंबर 2026 की FIR ने जांच को एक नए कानूनी चरण में पहुंचा दिया है. अब मामला केवल यह सवाल नहीं रह गया है कि दिशा की मौत आत्महत्या थी या नहीं. FIR ने कथित गैंगरेप, हत्या, आपराधिक साजिश, सबूत मिटाने और सरकारी रिकॉर्ड में कथित गड़बड़ी जैसे कई पहलुओं को जांच के दायरे में ला दिया है. लेकिन इस FIR की सबसे अहम कानूनी विशेषता यह है कि इसमें लगाए गए आरोपों और नामों को अभी जांच योग्य आरोप के रूप में ही देखा गया है. CBI को अब पुराने रिकॉर्ड को दोबारा खंगालने के साथ-साथ CCTV, मोबाइल डेटा, मेडिकल दस्तावेज, FSL रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम सामग्री, गवाहों के बयान और कथित scene reconstruction की स्वतंत्र forensic जांच करनी होगी. अगर इन सभी कड़ियों से एक evidentiary chain बनती है, तो केस की दिशा पूरी तरह बदल सकती है. लेकिन यदि आरोपों के समर्थन में पर्याप्त वैज्ञानिक और स्वतंत्र साक्ष्य नहीं मिलते हैं, तो केवल FIR में दर्ज आरोपों के आधार पर हत्या या गैंगरेप को कानूनी रूप से सिद्ध नहीं माना जा सकता.



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