साल 1980 में शुरू हुई एक ऐतिहासिक विकास यात्रा अब अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रही है। विश्व बैंक ने साल 2031 तक चीन को दिए जाने वाले अपने सभी कर्ज (लेंडिंग) को पूरी तरह समाप्त करने की योजना बनाई है। यह कदम केवल एक वित्तीय समझौते की समाप्ति नहीं है, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन के एक महाशक्ति के रूप में उभरने और वैश्विक विकास प्राथमिकताओं के बदलने का सबसे बड़ा संकेत है। इस रणनीतिक बदलाव का असर पूरी दुनिया के वित्तीय और विकासशील ढांचे पर पड़ना तय है।
चीन को मिलने वाले कर्ज में इतनी बड़ी कटौती क्यों की जा रही है?
विश्व बैंक और चीन के बीच साझेदारी धीरे-धीरे समाप्त हो रही है। आंकड़ों के अनुसार, चीन को दी जाने वाली सालाना ऋण राशि जो साल 2017 में लगभग 2.4 बिलियन डॉलर थी, वह साल 2025 तक घटकर लगभग 750 मिलियन डॉलर रह जाने का अनुमान है। इस क्रमिक कटौती का मुख्य कारण यह है कि चीन अब एक गरीब या जरूरतमंद देश नहीं रहा, बल्कि वह गहरी घरेलू पूंजी और मजबूत वित्तीय संसाधनों से संपन्न हो चुका है। हालांकि इस वित्तीय विदाई का चीन के अपने विकास पर बेहद मामूली असर पड़ेगा, लेकिन वैश्विक मंच पर इसके दूरगामी परिणाम होंगे।
एक कर्जदार से दुनिया का बड़ा कर्जदाता कैसे बन गया चीन?
जब चीन 1980 में विश्व बैंक में शामिल हुआ था, तब उसे बुनियादी ढांचे, कृषि, स्वास्थ्य और पर्यावरण प्रबंधन के लिए भारी कर्ज की जरूरत थी। लेकिन पिछले चार दशकों में चीन ने अपनी अर्थव्यवस्था का कायाकल्प कर लिया है। आज चीन दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। वह अब कर्ज लेने के बजाय ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ (बीआरआई), ‘एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक’ (एआईआईबी) और ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (एनडीबी) जैसे संगठनों के जरिए खुद दुनिया के अन्य देशों को कर्ज देने वाला एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय वित्तीय केंद्र बन चुका है।
इस बड़े फैसले के पीछे की असली भू-राजनीति क्या है?
विश्व बैंक द्वारा चीन से हाथ पीछे खींचने के पीछे आर्थिक कारणों के साथ-साथ गहरा राजनीतिक दबाव भी है। अमेरिका सहित कई बड़े शेयरधारकों का लंबे समय से यह तर्क रहा है कि विश्व बैंक जैसे संस्थानों का गठन मुख्य रूप से गरीबी मिटाने और कम आय वाले देशों की मदद के लिए किया गया है। ऐसे में चीन जैसी आर्थिक महाशक्ति को ऋण सहायता जारी रखना तर्कसंगत नहीं है। अमेरिका और चीन के बीच व्यापार, तकनीक और वैश्विक वित्त में बढ़ते तनाव ने इस दबाव को और अधिक हवा दी है।
गरीब और विकासशील देशों पर अब इसका क्या असर पड़ेगा?
वैश्विक विकास और नीति निर्माताओं के लिए यह फैसला एक नए संसाधन आवंटन का द्वार खोल सकता है। चीन से बचने वाले इन फंड्स को अब अफ्रीका, दक्षिण एशिया और छोटे द्वीपीय देशों जैसे निम्न-आय वाले क्षेत्रों में डायवर्ट किया जा सकता है, जो कर्ज के बढ़ते बोझ और जलवायु परिवर्तन की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। साथ ही, चीनी कंपनियां भी अब विश्व बैंक के प्रोजेक्ट्स की जगह विकासशील देशों में नए व्यावसायिक अवसरों की तलाश करेंगी।
सहयोग और आगे की राह का भविष्य क्या होगा?
भले ही विश्व बैंक कर्ज देना बंद कर रहा है, लेकिन चीन के साथ उसका रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता संरक्षण और महामारी की तैयारी जैसे वैश्विक मुद्दों पर दोनों का तकनीकी सहयोग जारी रहेगा। यह बदलाव चीन को एक बड़े अंतरराष्ट्रीय वित्तीय भागीदार के रूप में और अधिक जिम्मेदारी लेने के लिए प्रेरित करेगा।



