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Insurance: इलाज के भारी-भरकम खर्च पर लगाम की तैयारी, क्या अब सस्ते होंगे निजी अस्पताल और खत्म होगी लूट-खसोट?


बीमार होना किसी भी परिवार के लिए न केवल एक मानसिक आघात होता है, बल्कि प्राइवेट अस्पतालों के भारी-भरकम बिल उनके जीवनभर की जमा-पूंजी को पल भर में साफ कर देते हैं। लेकिन अब, एशिया की सबसे तेज गति से बढ़ती मेडिकल महंगाई के बीच, भारत सरकार और बीमा नियामक एक ऐसे क्रांतिकारी बदलाव की तैयारी में हैं जो इलाज के बेलगाम खर्चों को हमेशा के लिए नियंत्रित कर सकता है। रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि सरकार हेल्थ इंश्योरेंस के पूरे ढांचे को बदलने के लिए बड़े सुधारों पर विचार कर रही है, जिसमें इलाज की दरें तय करने से लेकर क्लेम निपटारे के लिए एक राष्ट्रीय एक्सचेंज बनाना शामिल है।

आखिर क्यों भारत सरकार को हेल्थ इंश्योरेंस नियमों में इतने बड़े बदलाव करने पड़ रहे हैं?

भारत में इस समय मेडिकल महंगाई लगभग 12% से 14% सालाना की खतरनाक दर से बढ़ रही है, जो पूरे एशिया में सबसे अधिक आंकी गई है। इस बेलगाम महंगाई से मध्यम और गरीब परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ रहा है। इसके अलावा, हाल ही में आई एक संसदीय समिति की रिपोर्ट ने एक चौंकाने वाला अंतर उजागर किया है- जहां सरकारी अस्पतालों में भर्ती होने का औसत खर्च केवल 70 डॉलर (लगभग ₹6,680) आता है, वहीं प्राइवेट अस्पतालों में यह खर्च कई गुना बढ़कर सीधे 530 डॉलर (लगभग ₹50,580) तक पहुंच जाता है। इसी असमानता को देखते हुए सांसदों ने भी सरकार से निजी स्वास्थ्य सेवाओं को आम जनता के लिए किफायती बनाने का आग्रह किया है।

क्या है ‘कॉमन इंश्योरेंस प्लान’ और यह आम पॉलिसीधारकों की कैसे मदद करेगा?

वर्तमान में अलग-अलग बीमा कंपनियों की योजनाएं, शर्तें और दरें इतनी उलझाऊ और अलग-अलग होती हैं कि पॉलिसीधारक अक्सर बेहतर विकल्पों की तलाश में अपनी पॉलिसियां बदलते रहते हैं। इस उलझन को खत्म करने के लिए सरकार एक ‘कॉमन हेल्थ इंश्योरेंस प्रोडक्ट’ (सामान्य स्वास्थ्य बीमा उत्पाद) लाने की योजना बना रही है, जिसे सभी बीमा कंपनियों को अपने मौजूदा प्लान के साथ बेचना अनिवार्य होगा। इस कॉमन प्लान के तहत विभिन्न बीमारियों और इलाजों के लिए बीमा की सीमा और दरों को बिल्कुल एक समान कर दिया जाएगा। साथ ही, दवाओं और इलाज की प्रक्रियाओं की एक समान सूची होगी, जिससे आम लोगों को यह समझना बेहद आसान हो जाएगा कि उनकी पॉलिसी में वास्तव में क्या कवर है।

क्या अस्पतालों की मनमर्जी और बीमा से जुड़ी धोखाधड़ी पर अब लगाम लग सकेगी?

जी हां, नए सुधारों का सबसे बड़ा प्रहार इसी समस्या पर होने जा रहा है। सरकार का मुख्य विचार बीमा कंपनियों और अस्पतालों के बीच इलाज की दरों को पहले से तय करना है। दरें पहले से तय होने से मरीजों को पहले से पता होगा कि किस इलाज में कितना खर्च होना है और अस्पताल उनसे मनमाना शुल्क नहीं वसूल सकेंगे। इसके अलावा, उद्योग जगत के अनुमान बताते हैं कि लगभग 10% से 15% हेल्थ क्लेम फर्जी या गैर-जरूरी होते हैं। दरें तय होने से ऐसे धोखाधड़ी वाले दावों और अस्पतालों व इंश्योरेंस कंपनियों के बीच होने वाले विवादों में भारी कमी आएगी।

अस्पताल से छुट्टी के वक्त क्लेम पास होने के लंबे इंतजार से कैसे मुक्ति मिलेगी?

अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद घंटों तक बिल पास होने का इंतजार करना हर मरीज और उसके परिजनों के लिए एक बड़ा सिरदर्द होता है। इस प्रक्रिया को बेहद तेज और पारदर्शी बनाने के लिए सरकार ‘नेशनल हेल्थ क्लेम्स एक्सचेंज’ डिजिटल प्लेटफॉर्म को बड़े पैमाने पर अपनाने पर जोर दे रही है। स्वास्थ्य मंत्रालय और बीमा नियामक द्वारा संयुक्त रूप से विकसित यह प्लेटफॉर्म अस्पतालों और बीमा कंपनियों के बीच एक साझा डिजिटल ब्रिज की तरह काम करेगा। इससे क्लेम और बिलिंग का डेटा एक समान फॉर्मेट में तुरंत साझा हो सकेगा और अस्पताल से छुट्टी मिलने के समय क्लेम का निपटारा पलक झपकते ही हो जाएगा।

इन बड़े सुधारों का पूरा रोडमैप कब तक सामने आएगा?

भारत की 1.4 अरब की विशाल आबादी में बीमा पर होने वाला खर्च जीडीपी के 4% से भी कम है, जबकि इसका वैश्विक औसत 7% से अधिक है। सरकार का मुख्य उद्देश्य इस पहुंच को बढ़ाना है। फिलहाल, देश के 130 बिलियन डॉलर के विशाल बीमा उद्योग में 40 से अधिक बीमा कंपनियां सक्रिय हैं, जिन्होंने मार्च 2025 को समाप्त वित्तीय वर्ष में लगभग 1.17 ट्रिलियन डॉलर का प्रीमियम जुटाया है। इन ऐतिहासिक सुधारों की रूपरेखा तैयार करने के लिए भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) के प्रमुख की अध्यक्षता में एक विशेष पैनल काम कर रहा है, जिसमें अस्पतालों, उद्योगपतियों और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के प्रतिनिधि शामिल हैं। इस हाई-लेवल पैनल द्वारा इस साल के अंत तक अपनी अंतिम सिफारिशें सौंपे जाने की पूरी उम्मीद है।



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