International
oi-Siddharth Purohit
Israel Iran War: आपने थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया और बांग्लादेश जैसे देशों में सब्जियों, फलों और मछलियों के तैरते बाजार देखे होंगे, जहां नावों में लदा सामान एक खरीदार से दूसरे खरीदार तक जाता रहता है। कुछ ऐसा ही नजारा अब वैश्विक तेल बाजार में भी देखने को मिल रहा है। फर्क बस इतना है कि यहां सब्जियों या मछलियों की जगह रूसी कच्चा तेल है और नदियों की जगह हिंद महासागर और एशियाई समुद्रों में इसका कारोबार हो रहा है।
मझधार में फंसे तेल के टैंकर
मिडिल ईस्ट में चल रहे युद्ध के कारण Strait of Hormuz के पास समुद्री शिपिंग बुरी तरह प्रभावित हुई है। यह स्ट्रेट ऑफ होर्मूज दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। यहां बढ़ते तनाव की वजह से कई देशों को कहीं और से तेल की आपूर्ति ढूंढनी पड़ रही है। इसी कारण रूसी कच्चे तेल और ईंधन से भरे कई टैंकर अब एशियाई समुद्री मार्गों पर बिना तय डेस्टिनेशन के घूम रहे हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे तैरते बाजार में नावों पर बैठे व्यापारी खरीदार का इंतजार करते हैं।

भारत को कैसे मिलेगा फायदा?
भारत में अभी तेल की किल्लत नहीं है। बकौल सरकारं अभी पर्याप्त तेल हमारे भंडार में है। लेकिन भारत अगर ठीक से इस मौके को भुनाए तो बहुत सारा तेल जो समुद्र में यूं ही पड़ा है, उसे बेहद कम दाम में खरीद सकता है। इससे भारत में तेल की कीमते भी कम हो सकेंगी और अगर ये युद्ध लंबा चलता है तो तेल की कमी होने का खतरा भी बिल्कुल न के बराबर होगा। चूंकि इसमें से 3.1 लाख टन तेल रिफाइंड है तो बहुत सारा पैसा और समय उसे प्रोसेस करने में भी बचेगा। भारत में रोजाना 7,07,000 टन कच्चा तेल 23 अलग-अलग रिफाइनरी में रिफाइन होता है। ऐसे में अगर देखें तो 6 महीने का स्टॉक एक साथ मिल सकता है।
कितनी कारगर है अमेरिका की छूट?
अमेरिकी सरकार द्वारा दी गई अस्थायी छूट के बाद एशियाई जल क्षेत्र में करीब 30 तेल टैंकरों में भरा रूसी कच्चा तेल और ईंधन अब खरीदने के लिए उपलब्ध हो गया है। यह छूट उन खेपों के लिए दी गई है जो पहले से ही समुद्र में थीं। Bloomberg और एनर्जी एनालिसिस फर्म Kpler के जहाज ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक इन टैंकरों में कम से कम 1.9 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल और करीब 3.1 लाख टन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पाद मौजूद हैं।
बीच समुद्र में लग रही तेल टैंकरों की बोली
इनमें से कई जहाज Indian Ocean, Arabian Sea और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री मार्गों से गुजर रहे हैं। कुछ टैंकर सिंगापुर और मलेशिया जैसे स्थानों की ओर संकेत दे रहे हैं। ये जगहें अक्सर ऐसे वेटिंग रूम की तरह काम करती हैं जहां व्यापारी सौदे तय करते हैं और टैंकर खरीदार मिलने तक लंगर डाले रहते हैं। कई जहाजों पर ‘For Orders’ लिखा होता है, जिसका मतलब है कि उनका कोई तय ठिकाना नहीं है और उन्हें पहले खरीदने वाले देश को बेचा जा सकता है। आसान भाषा में आप इसे समझ सकते हैं कि बीच समुद्र में तेल टैंकरों की बोली लग रही है।
रूसी यूराल्स क्रूड ने फिर मचाई धूम
इन टैंकरों में रूस का Urals crude और अन्य ग्रेड का तेल शामिल है। Russia‑Ukraine War से जुड़े प्रतिबंधों के बाद रूस को यह तेल भारी छूट पर बेचना पड़ता था। लेकिन अब मिडिल ईस्ट संकट के कारण वैश्विक आपूर्ति को लेकर चिंता बढ़ गई है और तेल की कीमतें ऊपर जा रही हैं। ऐसे में रूसी तेल एक बार फिर खरीदारों के लिए पहली पसंद बन गया है।
रूस को मिल रहा आर्थिक फायदा
यह स्थिति मॉस्को के लिए फायदेमंद साबित हो रही है। मिडिल ईस्ट से तेल आपूर्ति पर खतरा बढ़ने के कारण कई खरीदार फिर से रूसी तेल की ओर रुख कर रहे हैं। इससे Vladimir Putin की सरकार को एक्सपोर्ट से ज्यादा कीमत मिल रही है। खासकर ऐसे समय में जब यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध को जारी रखने के लिए रूस के लिए तेल से मिलने वाला रिवेन्यू उनके लिए बेहद जरूरी हो।
भारत और चीन सबसे बड़े खरीदार
रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में India और China शामिल हैं। हाल के दिनों में इन दोनों देशों ने रूसी तेल का इम्पोर्ट काफी बढ़ा दिया है। इसकी वजह यह है कि उनकी रिफाइनरियां डर रही हैं कि अगर मिडिल ईस्ट का संकट और बढ़ा तो वैश्विक आपूर्ति और प्रभावित हो सकती है। इसलिए वे पहले से ही ज्यादा से ज्यादा तेल खरीदकर सुरक्षित करना चाहती हैं।
समुद्र में बन गया है ‘फ्लोटिंग ऑयल मार्केट’
फिलहाल व्यापारियों का कहना है कि हिंद महासागर और एशियाई समुद्री क्षेत्रों के कुछ हिस्से अब सचमुच एक तैरते हुए बाजार जैसे दिखने लगे हैं। यहां पर व्यापारी और खरीददार दोनों ही तैर रहे हैं।
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