कर्ज में डूबी कंपनी जेपी एसोसिएट्स लिमिटेड (जेएएल) के अधिग्रहण को लेकर कॉर्पोरेट जगत के दिग्गज कंपनी अडानी और वेदांता के बीच कानूनी जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (एनसीएलएटी) ने बुधवार को वेदांता ग्रुप की याचिकाओं पर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। पिछले दिनों वेदांता ने अडानी एंटरप्राइजेज की बोली को चुने जाने के फैसले को चुनौती दी थी।
चेयरमैन न्यायमूर्ति अशोक भूषण और तकनीकी सदस्य बरुण मित्रा की दो सदस्यीय पीठ ने इस मामले में मैराथन सुनवाई पूरी की। सुनवाई के दौरान वेदांता, रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल (आरपी), लेनदारों की समिति (सीओसी) और अडानी एंटरप्राइजेज के वकीलों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं। ट्रिब्यूनल ने अब दोनों पक्षों को अगले दो दिनों के भीतर अपने लिखित तर्क प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
वेदांता ने क्या-क्या कहा?
वेदांता की ओर से पेश अधिवक्ता ने जेपी एसोसिएट्स के लेनदारों की ओर से अपनाए गए मूल्यांकन मानकों पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने दलील दी कि वेदांता ने जेएएल के लिए ₹17,926 करोड़ की भारी-भरकम बोली लगाई थी। वहीं, अडानी एंटरप्राइजेज ने ₹14,535 करोड़ की बोली लगाई। वेदांता का आरोप है कि अधिक मूल्य की पेशकश के बावजूद उनकी बोली को खारिज कर अडानी की कम मूल्य वाली बोली को चुनना तर्कसंगत नहीं है।
केवल पैसा ही एकमात्र पैमाना नहीं
दूसरी ओर, लेनदारों की समिति (सीओसी) ने अपना बचाव किया। सीओसी ने कहा कि पूरी प्रक्रिया दिवाला और दिवालियापन संहिता (आईबीसी) के नियमों के दायरे में रहकर की गई है। उनका कहना है कि किसी भी बोलीदाता के पास केवल उच्चतम मूल्य के आधार पर जीत का गारंटीशुदा अधिकार नहीं होता।
लेनदारों ने तर्क दिया कि किसी भी रिवाइवल प्लान का मूल्यांकन कई कारकों पर किया जाता है। इसमें तत्काल मिलने वाला कैश , योजना की व्यावहारिकता, भविष्य की कार्यक्षमता और निष्पादन की क्षमता देखी जाती है, न कि केवल बड़ी रकम। गौरतलब है कि वोटिंग प्रक्रिया में अडानी एंटरप्राइजेज को 89 प्रतिशत लेनदारों का समर्थन मिला था, जबकि डालमिया सीमेंट और वेदांता क्रमश, दूसरे और तीसरे स्थान पर रहे थे।
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कानूनी उतार-चढ़ाव और सुप्रीम कोर्ट का रुख
इससे पहले 17 मार्च को एनसीएलटी ने अडानी ग्रुप की बोली को मंजूरी दी थी, जिसके खिलाफ अनिल अग्रवाल के नेतृत्व वाले वेदांता ग्रुप ने अपील की थी। 24 मार्च को एनसीएलएटी ने इस पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया था, लेकिन यह साफ कर दिया था कि पूरा मामला अपीलों के अंतिम परिणाम के अधीन रहेगा। मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने भी स्टे देने से मना कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश जरूर दिया था कि यदि निगरानी समिति कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला लेती है, तो उसे पहले ट्रिब्यूनल की मंजूरी लेनी होगी।
आखिर क्यों मची है जेएएल खरीदने की होड़?
जून 2024 में ₹57,185 करोड़ के भारी कर्ज के कारण दिवालिया प्रक्रिया में शामिल हुई जेपी एसोसिएट्स के पास देश की बेशकीमती संपत्तियां मौजूद हैं। अगर रियल एस्टेट की बात की जाए तो ग्रेटर नोएडा में जेपी ग्रीन्स, नोएडा में विशटाउन का हिस्सा और जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के पास स्थित इंटरनेशनल स्पोर्ट्स सिटी जेपी एसोसिएट्स की ही है।
इसके इतर होटल और हॉस्पिटैलिटी क्षेत्र में भी कंपनी की मजबूत पकड़ है। दिल्ली-एनसीआर, आगरा और मसूरी जैसे पर्यटन स्थलों पर स्थित 5 आलीशान होटल भी कंपनी के नाम है। वहीं, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में चार सीमेंट प्लांट और लीज पर ली गई चूना पत्थर की खदानें भी जेपी एसोसिएट्स के अधीन है। जेपी पावर वेंचर्स और यमुना एक्सप्रेसवे टोलिंग जैसी महत्वपूर्ण सहायक कंपनियों में हिस्सेदारी भी है। अब सबकी निगाहें एनसीएलएटी के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो यह तय करेगा कि जेपी एसोसिएट्स का भविष्य अडानी के हाथों में सुरक्षित है या वेदांता की दलीलों में दम है।



