मुंबई अंडरवर्ल्ड की दुनिया में 1990 का दशक गैंगवार, सुपारी किलिंग और खूंखार शूटरों के लिए जाना जाता था. इन्हीं नामों में एक नाम था सैयद मुदाकिर मुदस्सिर हुसैन उर्फ मुन्ना झिंगाडा. छोटा शकील गैंग का यह शार्पशूटर उस दौर में दाऊद इब्राहिम के गैंग यानी डी-कंपनी के सबसे भरोसेमंद गुर्गों में गिना जाता था.
आज एक बार फिर मुन्ना झिंगाडा का नाम चर्चा में है. खुफिया एजेंसियों और पुलिस सूत्रों के मुताबिक अंडरवर्ल्ड के कुछ पुराने नेटवर्क फिर सक्रिय होने की कोशिश कर रहे हैं और इसी वजह से 1997 की वह पुलिस फाइल दोबारा सुर्खियों में आ गई है, जिसमें मुन्ना झिंगाडा की गिरफ्तारी का पूरा ब्योरा दर्ज है.
होटल ड्रीम गर्ल के बाहर बिछा था जाल
नवंबर 1997 में मुंबई पुलिस की एंटी एक्सटॉर्शन सेल को सूचना मिली थी कि छोटा शकील गैंग का शार्पशूटर मुन्ना झिंगाडा अंधेरी और जोगेश्वरी के बीच स्थित होटल ड्रीम गर्ल में आने वाला है. पुलिस को शक था कि वह किसी बड़ी शूटआउट वारदात को अंजाम देने की तैयारी में है.
सूचना मिलते ही तत्कालीन अतिरिक्त पुलिस आयुक्त डॉ. सत्यपाल सिंह के निर्देश पर एक विशेष टीम बनाई गई. टीम में उस समय के सब-इंस्पेक्टर और बाद में एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के तौर पर मशहूर हुए दया नायक समेत कई अधिकारी शामिल थे.
22 नवंबर 1997 की रात करीब 8 बजे मुन्ना झिंगाडा एक ऑटो रिक्शा से होटल ड्रीम गर्ल के पास पहुंचा. जैसे ही वह ऑटो से उतरा, दया नायक ने उसकी पहचान कर ली. इसके बाद पुलिस टीम ने उसे चारों तरफ से घेर लिया और बिना मौका दिए गिरफ्तार कर लिया.
गिरफ्तारी के वक्त क्या मिला था?
पुलिस तलाशी में मुन्ना झिंगाडा के पास से दो विदेशी पिस्तौल, कई जिंदा कारतूस और एक मोबाइल फोन बरामद हुआ था. बरामद हथियारों में ब्राजील निर्मित 9 एमएम फोर्गास टॉरस एसएसए पिस्तौल भी शामिल थी, जिसे अंडरवर्ल्ड की भाषा में ‘मिनी कार्बाइन’ कहा जाता था. इस हथियार की मैगजीन में 14 कारतूस भरे हुए थे और इसकी क्षमता 20 राउंड की थी.
इसके अलावा उसके पास एक स्टार पिस्तौल, अतिरिक्त मैगजीन और दर्जनों जिंदा कारतूस भी मिले थे. उस समय मुंबई पुलिस ने इसे बड़ी कामयाबी माना था क्योंकि इस तरह के हथियार आम अपराधियों के पास नहीं मिलते थे.
पूछताछ में कबूले थे कई राज
पुलिस का दावा था कि बरामद हथियारों और अन्य सबूतों ने उसे कई संगीन अपराधों से जोड़ने में मदद की.
कैसे बना डी-कंपनी का भरोसेमंद शूटर?
मुन्ना झिंगाडा का अपराध जगत से नाता 1990 के दशक की शुरुआत में ही जुड़ गया था. वर्ष 1990 में वह जोगेश्वरी स्थित आईवाई कॉलेज परिसर में वजीर नामक व्यक्ति की हत्या के मामले में गिरफ्तार हुआ था.
करीब 16 महीने जेल में रहने के बाद वह बाहर आया, लेकिन अपराध की दुनिया से उसका रिश्ता खत्म नहीं हुआ. 1994 में हत्या के प्रयास और 1995 में निसार राशनवाला हत्याकांड में उसका नाम सामने आया.
एक बार फिर जेल जाने के दौरान उसकी मुलाकात छोटा शकील गैंग के लोगों से हुई. यहीं से उसका सीधा संपर्क डी-कंपनी से बना और वह धीरे-धीरे गैंग का भरोसेमंद शूटर बन गया.
पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार जुलाई 1997 में जेल से बाहर आने के बाद उसने अपने गैंग को कई अहम जानकारियां दीं और कुछ ही समय बाद कई सनसनीखेज वारदातों में उसका नाम सामने आया.
दया नायक से दुश्मनी की शुरुआत
मुंबई पुलिस के पुराने अधिकारियों के मुताबिक मुन्ना झिंगाडा की गिरफ्तारी छोटा शकील गैंग के लिए बड़ा झटका थी. यही वह दौर था जब दया नायक का नाम अंडरवर्ल्ड के बीच तेजी से उभर रहा था.
कहा जाता है कि गिरफ्तारी के बाद गैंग के कई सदस्यों ने दया नायक को निशाने पर लेने की धमकियां भी दी थीं. हालांकि मुंबई पुलिस की लगातार कार्रवाई ने अंडरवर्ल्ड के कई नेटवर्क को कमजोर कर दिया.
2026 में फिर क्यों चर्चा में है नाम?
करीब तीन दशक बाद मुन्ना झिंगाडा का नाम फिर चर्चा में है. सुरक्षा एजेंसियां अंडरवर्ल्ड के पुराने नेटवर्क और उनके सक्रिय संपर्कों पर नजर बनाए हुए हैं. इसी बीच 1997 की वह पुलिस फाइल फिर चर्चा में आ गई, जिसमें दर्ज है कि किस तरह दया नायक और उनकी टीम ने छोटा शकील गैंग के सबसे भरोसेमंद शूटरों में से एक को हथियारों समेत गिरफ्तार किया था.
मुंबई अंडरवर्ल्ड के इतिहास में यह गिरफ्तारी आज भी उन मामलों में गिनी जाती है, जिसने D-कंपनी के नेटवर्क को बड़ा झटका दिया था.



