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Report: तेल, महंगाई और कमजोर मानसून से अर्थव्यवस्था को खतरा, जानें वित्त मंत्रालय की ओर से क्या चेतावनी मिली


आर्थिक मामलों के विभाग ने मई की मासिक आर्थिक समीक्षा में भारत के निकट भविष्य के आर्थिक परिदृश्य को सतर्क व लचीलेपन वाला बताया। विभाग ने कहा कि वैश्विक झटकों के बावजूद घरेलू बुनियादी सिद्धांत मजबूत हैं। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतें, सख्त वित्तीय स्थितियां और कमजोर मानसून को खपत व महंगाई के लिए प्रमुख जोखिम बताया गया है।

रिपोर्ट के अनुसार, विनिर्माण और सेवा क्रय प्रबंधक सूचकांक (पीएमआई) विस्तार क्षेत्र में हैं। श्रम बाजार स्थिर है और विदेशी मुद्रा भंडार बाहरी झटकों से सुरक्षा प्रदान करता है। विभाग ने स्वीकार किया कि पश्चिम एशिया संघर्ष के बाद वैश्विक वातावरण चुनौतीपूर्ण हो गया है। ऊंची कच्चे तेल की कीमतें और प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की कमजोर वृद्धि भारत के लिए चुनौतियां हैं।

महंगाई की गतिशीलता पर सतर्कता आवश्यक है। खुदरा महंगाई और थोक कीमतों के बीच अंतर ऊपरी स्तर पर लागत दबाव का संकेत देता है। अप्रैल 2026 में खुदरा महंगाई मामूली रूप से 3.48 फीसदी बढ़ी, जो भारतीय रिजर्व बैंक के लक्ष्य से कम रही। लेकिन थोक महंगाई वैश्विक ऊर्जा कीमतों और मुद्रा अवमूल्यन के कारण तेजी से 8.3 फीसदी तक पहुंच गई। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि और कम मानसून खाद्य कीमतों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकता है।

महंगाई का दबाव कितना?

आर्थिक मामलों के विभाग की समीक्षा के अनुसार, खुदरा महंगाई और थोक कीमतों में अंतर चिंताजनक है। यह दर्शाता है कि उत्पादन लागत बढ़ रही है, जिसका असर जल्द ही उपभोक्ताओं पर दिख सकता है। अप्रैल 2026 में खुदरा महंगाई 3.48 फीसदी रही, जबकि थोक महंगाई 8.3 फीसदी पर पहुंच गई। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी और कमजोर मानसून से खाद्य कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

औद्योगिक लचीलेपन और भविष्य की चुनौतियों के बारे में क्या बताया गया?

अप्रैल 2026 में औद्योगिक गतिविधि ने मिश्रित संकेत दिखाए, पर सीमेंट, इस्पात और बिजली उत्पादन में लचीलापन रहा। वित्त वर्ष 26 में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 94.5 अरब डॉलर के ऐतिहासिक उच्च स्तर पर पहुंच गया। होर्मुज जलडमरूमध्य में व्यवधान भारत के बाहरी और मूल्य परिदृश्य के लिए महत्वपूर्ण है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने दीर्घकालिक औसत का करीब 92 फीसदी मानसून वर्षा का अनुमान लगाया है। वर्षा की कमी और भू-राजनीतिक स्थितियां खाद्य महंगाई, ग्रामीण मांग व समग्र वृद्धि को प्रभावित कर सकती हैं।



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