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Supreme Court: चेक बाउंस के मामलों में मिलेगी राहत या चलेगी आपराधिक कार्यवाही? तीन जजों की बेंच करेगी फैसला


जब कोई कंपनी दिवालिया होने की कगार पर हो और उसके खिलाफ रिकवरी की कार्यवाही रुकी हुई हो, तो क्या उसके द्वारा दिए गए चेक के बाउंस होने पर भी उसे कानूनी छूट मिलेगी? भारत के कॉरपोरेट और बैंकिंग जगत से जुड़े इस बेहद अहम सवाल को सुप्रीम कोर्ट ने अब 3 जजों की एक बड़ी बेंच के पास विचार के लिए भेज दिया है। 

सुप्रीम कोर्ट को यह तय करना है कि इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (IBC) यानी दिवालिया कानून के तहत मिलने वाले ‘मोरेटोरियम’ (कानूनी कार्यवाही पर रोक) का फायदा क्या नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 138 (चेक बाउंस) के तहत चल रहे आपराधिक मामलों में भी मिलेगा या नहीं।

क्या है पूरा विवाद और मोरेटोरियम का नियम?

दिवालिया कानून के तहत, जब भी किसी डिफाल्टर कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू होती है, तो उसके खिलाफ चल रहे सभी रिकवरी मामलों पर रोक  लगा दी जाती है। इसका मुख्य उद्देश्य कंपनी की संपत्तियों को बचाना होता है, ताकि या तो कंपनी को दोबारा खड़ा किया जा सके या फिर संपत्तियों को बेचकर लेनदारों का पैसा चुकाया जा सके। 

हाल ही में ‘दिनेशचंद सुराणा बनाम यूको बैंक’ मामले में यह विवाद उठा कि क्या कोई व्यक्ति अपनी पर्सनल इन्सॉल्वेंसी के दौरान चेक बाउंस के तहत चल रहे आपराधिक मुकदमों को रोकने के लिए इस मोरेटोरियम का ढाल के रूप में इस्तेमाल कर सकता है। 

पुराना नजरिया बनाम कोर्ट का नया सख्त रुख

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की 2 जजों की बेंच ने इस मामले पर बुधवार को अपना फैसला सुनाया। जस्टिस पारदीवाला ने 151 पन्नों का विस्तृत फैसला लिखते हुए इस मामले को मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के पास तीन जजों की बेंच गठित करने के लिए भेजा है।



दरअसल, अब तक कानूनी क्षेत्र में 2021 के एक फैसले को आधार माना जाता था। उस फैसले में चेक बाउंस की कार्यवाही को ‘आपराधिक भेड़िये के कपड़ों में सिविल भेड़’ (civil sheep in a criminal wolf’s clothing) कहा गया था, जिसका अर्थ यह निकाला गया कि चूंकि मुख्य लक्ष्य सिर्फ पैसा वसूलना है, इसलिए दिवालिया प्रक्रिया के दौरान ऐसे मामलों पर रोक लग जानी चाहिए। 



लेकिन जस्टिस पारदीवाला ने इस विचार पर असहमति जताई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धारा 138 के तहत कार्यवाही का मुख्य उद्देश्य पैसा वसूलना नहीं है, बल्कि व्यावसायिक लेन-देन में भरोसा कायम रखने के लिए विधायिका ने जानबूझकर इसे ‘आपराधिक रंग’ दिया है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर चेक बाउंस के आरोपियों को मोरेटोरियम की सुरक्षा दी जाती है, तो यह उन्हें अपनी आपराधिक जिम्मेदारी से बचने की छूट देने जैसा होगा।

बड़ी बेंच के सामने होंगे ये दो अहम सवाल

अब तीन जजों की बड़ी बेंच मुख्य रूप से इन दो सवालों के जवाब तलाशेगी:


  • पहला सवाल: क्या एनआई एक्ट की धारा 138 अर्ध-आपराधिक (quasi-criminal) होने के बावजूद मुख्य रूप से आपराधिक प्रकृति की है?

  • दूसरा सवाल: क्या आईबीसी का मोरेटोरियम चेक बाउंस की पूरी कार्यवाही पर लागू होना चाहिए या सिर्फ इसके मुआवजे (पैसों की रिकवरी) वाले हिस्से पर?

मुआवजे और डायरेक्टर्स को लेकर कोर्ट की राय

कोर्ट ने अपने फैसले में यह माना है कि चेक बाउंस मामले का जो मुआवजे वाला हिस्सा है, वह एक तरह का ‘सिविल’ उपाय है। अगर इस पर मोरेटोरियम लागू नहीं किया गया, तो डिफाल्टर की संपत्ति खत्म हो सकती है, जिससे अन्य सभी लेनदारों को नुकसान होगा। इसलिए केवल मुआवजे की रिकवरी वाले हिस्से पर मोरेटोरियम लागू होना चाहिए। 



इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि पर्सनल इन्सॉल्वेंसी के मामलों में कंपनी के डायरेक्टर्स पर भी मुआवजे के भुगतान को लेकर आईबीसी की धारा 96 और 101 के तहत मोरेटोरियम लागू होगा।



अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच पर टिकी हैं। यह अंतिम फैसला न केवल बैंकों और वित्तीय संस्थानों के लिए अहम होगा, बल्कि उन कॉरपोरेट डायरेक्टर्स की जिम्मेदारियां भी तय करेगा जो दिवालिया प्रक्रिया के पीछे छिपकर चेक बाउंस के आपराधिक मामलों से बचने की कोशिश करते हैं।



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