अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति एक बार फिर चर्चा में है। 25 अमेरिकी राज्यों ने ट्रंप प्रशासन के खिलाफ मुकदमा दायर किया है। इन राज्यों का आरोप है कि ये नए टैरिफ फरवरी में सुप्रीम कोर्ट द्वारा रद्द किए गए आयात करों को बदलने का बहाना हैं। पिछले महीने यानी जुलाई में अमेरिका ने 59 देशों और यूरोपीय संघ पर दोहरे अंक वाले टैरिफ लगाए थे। ये टैरिफ जबरन श्रम से उत्पादित आयात पर पर्याप्त कार्रवाई न करने के आरोप में लगाए गए।
ट्रंप की टैरिफ नीति का विरोध क्यों?
नए टैरिफ तब प्रभावी हुए जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा लगाए गए अस्थायी टैरिफ की समय सीमा समाप्त हो गई। सोमवार को (अमेरिकी समय) 25 राज्यों की तरफ से किए गए मकदमे के संबंध में न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स ने कहा कि प्रशासन अवैध रूप से परिवारों और व्यवसायों पर कर बढ़ा रहा है। ट्रंप का तर्क है कि उच्च टैरिफ अमेरिकी विनिर्माण को पुनर्जीवित करेंगे। उन्होंने 1977 के इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) का हवाला दिया था। उन्होंने व्यापार घाटे को राष्ट्रीय आपातकाल बताते हुए लगभग हर देश से आयात पर टैरिफ लगाए थे।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है?
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि IEEPA टैरिफ को अधिकृत नहीं करता। इस फैसले के बाद प्रशासन को टैरिफ का भुगतान करने वाले आयातकों को वापसी भेजनी पड़ी। राजस्व की भरपाई के लिए ट्रंप ने अस्थायी 10 फीसदी वैश्विक टैरिफ लगाए, जो 24 जुलाई को समाप्त हो गए। अब ट्रंप 1974 के ट्रेड एक्ट की धारा 301 के तहत अधिक स्थायी टैरिफ लगा रहे हैं। यह धारा राष्ट्रपति को अनुचित व्यापार प्रथाओं में शामिल देशों के खिलाफ आयात कर लगाने की अनुमति देती है। ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में चीन पर बड़े टैरिफ लगाने के लिए धारा 301 का इस्तेमाल किया था, और वे अदालती चुनौतियों में भी टिके रहे थे।
व्हाइट हाउस के प्रवक्ता ने क्या कहा?
प्रशासन ने जबरन श्रम टैरिफ लगाने के लिए धारा 301 का आह्वान किया है। ये टैरिफ 10 फीसदी से 12.5 फीसदी तक हैं। ये उन देशों को प्रभावित करते हैं जो अमेरिकी आयात का 99 फीसदी प्रदान करते हैं। व्हाइट हाउस के प्रवक्ता कुश देसाई ने कहा कि अमेरिका अपने वैध अधिकार का उपयोग कर रहा है। उन्होंने कहा कि जबरन श्रम वाले सामान के आयात पर प्रतिबंध लागू न करना अनुचित है और अमेरिकी कारोबार पर बोझ डालता है।



