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एलटीसीजी टैक्स घटने से लौटेंगे विदेशी निवेशक?: बाजार नियामक सेबी ने की रियायत की सिफारिश; किसे होगा फायदा


पिछले दो वर्षों में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) ने भारतीय शेयर बाजार से रिकॉर्ड 64 अरब डॉलर (लगभग 5.3 लाख करोड़ रुपये) की भारी-भरकम निकासी की है। इस बड़े पलायन के बाद से दलाल स्ट्रीट पर यह मांग लगातार जोर पकड़ रही है कि सरकार विदेशी निवेशकों को लुभाने के लिए लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स यानी एलटीसीजी टैक्स को खत्म या कम करे। हाल ही में बाजार नियामक सेबी की सिफारिशों के बाद इस पर चर्चा और तेज हो गई है।

अभी क्या हैं टैक्स के नियम?

भारत में सूचीबद्ध शेयरों पर फिलहाल 20 फीसदी शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स और 12.5 फीसदी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन्स टैक्स के अलावा सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (एसटीटी) भी लगाया जाता है। रिपोर्ट के मुताबिक, सेबी ने विदेशी निवेशकों के लिए एलटीसीजी टैक्स हटाने की सिफारिश की है। सरकार भी फरवरी के बजट से पहले इस पर निवेशकों और टैक्स विशेषज्ञों से राय ले रही है।

रुपये में मुनाफा, डॉलर में घाटा: विदेशी निवेशकों की परेशानी

विदेशी निवेशकों के लिए टैक्स की गणना डॉलर के बजाय रुपये में हुए मुनाफे के आधार पर की जाती है। इसका मतलब है कि कई बार निवेशक को रुपये में मुनाफा दिखाई देता है, लेकिन डॉलर के लिहाज से या रुपये की कीमत में गिरावट के कारण उसे वास्तव में नुकसान होता है। इसके बावजूद उसे टैक्स चुकाना पड़ता है। इसे फैंटम गेन्स कहा जाता है।

टैक्स राहत से कितना पैसा आ सकता है?

जेएम फाइनेंशियल के विश्लेषकों का अनुमान है कि यदि विदेशी निवेशकों के लिए एलटीसीजी टैक्स पूरी तरह समाप्त कर दिया जाए, तो सबसे अनुकूल परिदृश्य में भी वित्त वर्ष 2027-28 तक मुश्किल से 3 से 5 अरब डॉलर का नया निवेश आ सकता है। पिछले दो वर्षों में हुई 64 अरब डॉलर की निकासी के मुकाबले यह रकम काफी छोटी है। इससे औसत विदेशी निवेशक के सालाना डॉलर रिटर्न में सिर्फ 2.2 फीसदी की बढ़ोतरी होगी। ग्रो के फंड मैनेजर और रिसर्च हेड नीरज करखेरा का कहना है कि अकेले टैक्स व्यवस्था को आसान बनाने से विदेशी पूंजी भारत वापस नहीं लौट सकती।

कच्चे तेल की कीमतें भी तय करती हैं विदेशी निवेश की दिशा

पिछले दो दशकों के आंकड़े बताते हैं कि टैक्स के मुकाबले कच्चे तेल की कीमतें विदेशी निवेश के प्रवाह को तत्काल ज्यादा प्रभावित करती हैं। जब ब्रेंट क्रूड की कीमत 105 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर रहती है, तो ऐतिहासिक रूप से विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजार में भारी बिकवाली की है। इसके विपरीत, कच्चे तेल की कीमत 90 डॉलर से नीचे या 75 डॉलर के आसपास रहने पर विदेशी निवेश का प्रवाह सकारात्मक हो जाता है।

आकर्षक वैल्यूएशन के बावजूद बिकवाली की चुनौती

लंबी बिकवाली के बाद निफ्टी का फॉरवर्ड प्राइस-टू-अर्निंग (पी/ई) मल्टीपल गिरकर 17.1 गुना पर आ गया है। ऐतिहासिक रूप से इसे निवेश के लिए आकर्षक स्तर माना जाता है। हालांकि, पिछले बाजार झटकों ने साबित किया है कि केवल आकर्षक वैल्यूएशन के भरोसे विदेशी निवेशकों की बिकवाली नहीं रुकती।

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एफआईआई लौटे तो किन सेक्टरों को होगा फायदा?

यदि टैक्स नियमों में राहत मिलती है और वैश्विक परिस्थितियों में सुधार होता है, तो इसका सबसे पहले फायदा बड़े शेयरों और एफआईआई की अधिक हिस्सेदारी वाले सेक्टरों को मिल सकता है। अक्टूबर 2024 के बाद से विदेशी निवेशकों ने सबसे ज्यादा बिकवाली फाइनेंशियल शेयरों में की है। इस सेक्टर से करीब 16 अरब डॉलर की निकासी हुई है। इसके बाद आईटी और कंज्यूमर स्टेपल्स सेक्टर से 10-10 अरब डॉलर, ऑयल एंड गैस सेक्टर से 8.4 अरब डॉलर और ऑटो सेक्टर से 8.1 अरब डॉलर की निकासी हुई है।



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