वैश्विक ऊर्जा संकट और अल नीनो मौसम के संभावित प्रभावों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर एक बार फिर महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका है। एचएसबीसी की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इन आर्थिक और जलवायु संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक चालू वित्त वर्ष (FY27) में दो बार ब्याज दरों में इजाफा कर सकता है। इस रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि ऊर्जा संकट और अल नीनो से जुड़ी बाधाओं का यह संयोजन वित्त वर्ष 2027 के दौरान मुद्रास्फीति को उच्च स्तर पर धकेल सकता है और साथ ही आर्थिक विकास की गति को भी धीमा कर सकता है।
रिपोर्ट के आकलन के मुताबिक, ऊर्जा की बढ़ती कीमतों और तापमान से जुड़ी खाद्य मुद्रास्फीति के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए वित्त वर्ष 2027 में हेडलाइन मुद्रास्फीति औसतन 5.6 प्रतिशत रहने का अनुमान है। एचएसबीसी का आर्थिक मॉडल यह सुझाव देता है कि अल नीनो और तापमान में वृद्धि का संयुक्त प्रभाव एक वर्ष की अवधि में मुद्रास्फीति में 0.5 प्रतिशत तक का इजाफा कर सकता है। इसी आधार पर यह उम्मीद जताई गई है कि आरबीआई वर्ष 2026 की चौथी तिमाही और 2027 की पहली तिमाही में ब्याज दरों में दो बार बढ़ोतरी करेगा, जिससे रेपो रेट बढ़कर 5.75 प्रतिशत के स्तर तक पहुंच सकता है। ऊर्जा लागत, औद्योगिक फीडस्टॉक की कीमतों और संभावित अल नीनो घटना के एक साथ उत्पन्न होने से मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास को लेकर चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
यदि तापमान में वृद्धि पिछले 10 वर्षों के औसत के अनुरूप भी रहती है, तो मौसम संबंधी बाधाओं के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में उल्लेखनीय उछाल देखने को मिल सकता है। रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि वर्ष 2026 के अंत में अल नीनो की स्थिति उत्पन्न होती है, तो इसका एक बड़ा मुद्रास्फीति प्रभाव 2027 में महसूस किया जाएगा। इसके अलावा, एक गंभीर अल नीनो घटना खाद्य कीमतों में और भी तेज वृद्धि का कारण बन सकती है। हालांकि, देश के पास मौजूद अनाज का उच्च भंडार और भरे हुए गोदाम इस मुद्रास्फीति के दबाव को कुछ हद तक कम करने में मददगार साबित हो सकते हैं।
महंगाई में इस अपेक्षित वृद्धि के बावजूद, एचएसबीसी का मानना है कि आरबीआई दरों में आक्रामक बढ़ोतरी करने से बचेगा क्योंकि इसके परिणामस्वरूप आर्थिक विकास के भी धीमा होने की पूरी संभावना है। रिपोर्ट में भारत की जीडीपी विकास दर वित्त वर्ष 2027 के लिए 6 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जो एचएसबीसी के 7.4 प्रतिशत के पिछले पूर्वानुमान से काफी कम है। इन आर्थिक और मौसमी झटकों का सबसे गहरा प्रभाव देश के अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ने की आशंका है, जिसमें मुख्य रूप से ग्रामीण परिवार और छोटे व्यवसाय शामिल हैं। यह स्थिति भारत के आर्थिक विकास को गति देने वाले वर्तमान कारकों में भी बदलाव ला सकती है।
लगातार बढ़ रही ऊर्जा की कीमतें, औद्योगिक लागत का बढ़ता दबाव और जलवायु संबंधी बाधाएं नीति निर्माताओं के लिए वित्त वर्ष 2027 में एक बेहद कठिन व्यापक आर्थिक माहौल तैयार कर सकती हैं। अंततः, आरबीआई को अपनी आगामी मौद्रिक नीति कार्रवाइयों को तय करते समय मुद्रास्फीति पर नियंत्रण रखने और आर्थिक विकास की चिंताओं को दूर करने के बीच एक बेहद सतर्क व संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा।



